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ललिता गोयल जी. ये जो कि है. ये key है. बहुत ही जादुई किस्म की. हजार ताले खुल सकते हैं. पर उसके लिए किवाड़ खोलने पड़ेंगे. कहीं कुंडी खड़के तो पता चले कि भिड़े कहां हैं. आजकल क्या है. दीवारें खैंच दी गई हैं धरके. जैसे ठाकुरदास कक्का मौज में आ गए हों. धरके नर्रा दिए सबपे. जल्दी काम खैंचो बे. और उसके बाद दे तेरे की. ले तेरे की. किसे फुर्सत कि चौखट जड़े. अब वही नहीं तो काहे का दरवाजा. एक कविता पता नहीं क्यों आपका सवाल देखने के बाद याद आई.
हमने सुना है कि जिनको चुना है वो कहते हैं कि पूछना मना है.
देखा, आपने. कि का कितना मार्मिक इस्तेमाल है. सवाल पूछा. उसके लिए शुक्रिया. जाते जाते महाकवि कुमार विश्वास भी याद आ रहे हैं. उनका इस कि पर 99 साल का पट्टा हुआ है. बाकायदा शासनादेश से.
कि कोई दीवाना कहता है. कोई पागल समझता है.
यहां पर जो कि आता है न शुरुआत में. वही सबसे तरल होता है. वहीं सारी थमी सांसें छूटती हैं. जान को जान आती है. और हां. मुझे बहुत अच्छा लगा. कि आज भी पढ़ने सुनने वालों की जमात बाकी है. बाकी क्या है मैम. कि यहां सब बोलने वाले हैं. सुबह से लेकर शाम तक, दिन से लेकर रात तक, बस सब बोलते ही रहते हैं. सब बोलना चाहते हैैं. सब सुने जाना चाहते हैं. सुनना कोई नहीं चाहता. आपने कहा. हमने सुना. अब हमने कहा. आप सुनेंगी. बस इसी के चलते धरती अब भी घूम रही है. वर्ना ये भी कब की ठुनक गई होती. जय हिंद.
सौरभ द्विवेदी edited question ago
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