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राइटर होने की क्या शर्त है. कोई शर्त नहीं लिखना प्यार करना है. और जैसा कि मनोज कुमार गा गए हैं. इंदीवर का लिखा. पूरब और पश्चिम के लिए कोई शर्त होती नहीं प्यार में मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया नज़र में सितारे जो चमके ज़रा बुझाने लगी आरती का दिया तो ये जो सिलसिला है लिखने की चाहत का, इसे बिना शर्त के जारी रखना होगा. लिखना जिंदा होना है. आप पैदा हुए. रोए. दूध पिया. हगा. मूता. चले. बड़े हो गए. प्यार किया. सेक्स किया. बच्चे किए. इन सबके लिए घर बनाया. घूमे. फिरे. ये सब कुछ कहां दर्ज हो रहा है. आपके दिमाग में. अलग अलग शकलों, आवाजों में. लेकिन जब हंस उड़ जाएगा तब. ऐसा तो हो न पाया कि मुर्दा मरा. चिप निकाल कर बैंक में जमा. इसलिए लिखना जरूरी है. देह मरेगी. दुनिया भी मरेगी. नहीं मरेगा तो शब्द. उसे बनाने वाला अक्षर. क्योंकि वो एक आवाज है. दर्ज हुई. लिखो ताकि बने रहो. बीतने के बाद भी. लिखो ताकि सो सको. और जो जागो तो रौशनी वजन बनकर न आ गिरे. मगर कैसा लिखें. किसके लिए लिखें. एक कविता याद आ रही है. मेरे दोस्त वरुण ग्रोवर ने अनुवाद कर फेसबुक पर लगाई थी. कवि का नाम है चार्ल्स बुकोस्की. उसे पढ़ें. मेरे भरम, घमंड, दुविधा, झिझक सब शांत होते हैं इससे गुजरने के बाद. "तो तुम लेखक बनना चाहते हो?" (कवि: चार्ल्स बुकोस्की अनुवाद: वरुण ग्रोवर)
अगर फूट के ना निकले बिना किसी वजह के मत लिखो। अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े, तुम्हारे दिल और दिमाग़ और जुबां और पेट से मत लिखो। अगर घंटों बैठना पड़े अपने कम्प्यूटर को ताकते या टाइपराइटर पर बोझ बने हुए खोजते कमीने शब्दों को मत लिखो। अगर पैसे के लिए या शोहरत के लिए लिख रहे हो मत लिखो। अगर लिख रहे हो कि ये रास्ता है किसी औरत को बिस्तर तक लाने का तो मत लिखो। अगर बैठ के तुम्हें बार-बार करने पड़ते हैं सुधार जाने दो। अगर लिखने का सोच के ही होने लगता है तनाव छोड़ दो। अगर किसी और की तरह लिखने की फ़िराक़ में हो तो भूल ही जाओ अगर वक़्त लगता है कि चिंघाड़े तुम्हारी अपनी आवाज़ तो उसे वक़्त दो पर ना चिंघाड़े ग़र फिर भी तो सामान बाँध लो। अगर पहले पढ़ के सुनाना पड़ता है अपनी बीवी या प्रेमिका या प्रेमी या माँ-बाप या अजनबी आलोचक को तो तुम कच्चे हो अभी। अनगिनत लेखकों से मत बनो उन हज़ारों की तरह जो कहते हैं खुद को ‘लेखक’ उदास और खोखले और नक्शेबाज़ स्व-मैथुन के मारे हुए। दुनिया भर की लाइब्रेरियां त्रस्त हो चुकी हैं तुम्हारी क़ौम से मत बढ़ाओ इसे। दुहाई है, मत बढ़ाओ। जब तक तुम्हारी आत्मा की ज़मीन से लम्बी-दूरी के मारक रॉकेट जैसे नहीं निकलते लफ़्ज़, जब तक चुप रहना तुम्हें पूरे चाँद की रात के भेड़िये सा नहीं कर देता पागल या हत्यारा, जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता मत मत मत लिखो। क्यूंकि जब वक़्त आएगा और तुम्हें मिला होगा वो वरदान तुम लिखोगे और लिखते रहोगे जब तक भस्म नहीं हो जाते तुम या यह हवस। कोई और तरीका नहीं है कोई और तरीका नहीं था कभी।
उम्मीद है कि आपको कुछ मदद मिली होगी. लिखो. पढ़ो. ताकि बेचैनियों को बेवजह ही सही. इक नाम मिल सके. सादर सौरभ चार्ल्स की कविता को अंग्रेजी में सुनने के लिए ये वीडियो क्लिक करें https://www.youtube.com/watch?v=F_1EiVAb_O8
चंचल शुभी edited question ago
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