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पांच रुपए में 'फट्टा टॉकीज' में फिलिम देखने वालों के 16D न समझाओ, प्लीज

बड़ा हल्ला मचा है. कह रहे हैं 3D वीडी का बाप आ रहा है. 16D. ये कोई क्रांति नहीं है पहले बताए देते हैं. स्याला देश के इतने छोटे शहर जिनमें एक कायदे का अंदर से लाल तरबूज नहीं खोजे मिलता, वहीं मल्टीप्लेक्स खुल गए हैं. बड़े शहरों का तो भूल ही जाओ. वहां मूतने के भी पैसे पड़ते हैं. पता चला है कि कोई दवाखाना चलाने वाला बिन्निसमैन हजार करोड़ रुपए फंसा रहा है. फिल्म मेकिंग की लाइन में और बना क्या रहा है, महाभारत. एक ही लकीर को ये लोग इतना पीटेंगे कि लकीर की खाई बन जाए. कुछ साई फाई बनाते, अवतार टाइप की. लेकिन चलो महाभारत बना रहे हैं तो हिट होने के चांस हैं. कम से कम जनता गीता का उपदेश सुनने पिच्चर हाल तक चली जाएगी. जब सुलतान जैसी फिल्में चार सौ करोड़ से कम में मुंह नहीं सीधा करती तो वो तो बड़ी फिलिम होगी. आने दो.

लेकिन इन तमाम D, हजार करोड़ी और एपिक लाने वालों से कह दो थोड़ा हौले से. इनको पता नहीं है कि हम कौन से जमाने के फिल्म देखने वाले हैं. जब एक रुपए की तमाखू की पुड़िया में चूना साथ मिलता था. जब 2 रुपए के बीड़ी के बंडल में 14 बीड़ियां आती थीं. और स्कूल बंक करके खेत में छिपकर टॉकीज जाने की सज़ा मौत से भी बदतर होती थी. कुएं से पानी निकालने वाली रस्सी से बांधकर पिटाई होती थी. हम उस जमाने के पिच्चर हॉल में जाकर पिच्चर देखने वाले हैं.

इससे पहले कि हम गांव वाली रामकहानी लेकर बैठें और तुम सीधे गंवार लठइत घोषित कर दो, थोड़ा शहर वाले टॉकीज की बात कर लेते हैं. ताकि समझ लो खाली भुच्च देहाती नहीं हैं. शहर में भी रहे हैं कुछ दिन. तो लखनऊ चलो. सरकारी बस में बैठकर पूरा दो घंटा लगता था हमारे गांव से लखनऊ जाने में. सोचो कितना बड़ा कलेजा रहा होगा इस महापुरुष का जो सिर्फ फिल्म देखने के लिए पूरा दिन निकालकर लखनऊ चला गया. और रात होने से पहले लौट भी आया. तो लखनऊ में सबसे महंगा टॉकीज आनंद था. कैसरबाग चौराहे पर वाला. वहां की खासियत ये थी कि पोस्टर में लीड रोल वाले बंदे का पोस्टर बहुत लंबा रहता था.

आनंद बड़कए लोगन का टॉकीज था. कहा जाता था नाम बड़े और दर्शन छोटे हैं. क्योंकि उसमें पिच्चर देखना सबके बस का नहीं था. तो अपने हिसाब से लोगों ने एक थ्योरी निकाली थी. कि सबसे सही परदा लीला टॉकीज का है. वही लालबाग वाला. जहां गाड़ियों की मरम्मत होती है. पूरा कबाड़खाना खुला है. दिन भर सड़क के किनारे तसले में कस्टमर की गाड़ी से पेट्रोल निकालकर उसका इंजन धो रहे होते हैं. उसी लालबाग में स्थापित लीला टॉकीज. कहते हैं वहां का परदा बड़ा गजब का है. वहां पता नहीं किस दैव योग से मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पइसा वाला लग गई थी. उसके बाद पता नहीं ईश्वर की कौन सी लीला हुई कि लीला टॉकीज में कभी हिंदी फिल्म नहीं चली. और अब बात साउंड की. आवाज सबसे मस्त आती थी गुलाब टॉकीज में. कैसरबाग, गोलागंज स्थित गुलाब टॉकीज. क्रिश्चियन कॉलेज के सामने वाला गुलाब टॉकीज. इनके फोटो गूगल सर्च में नहीं आए हैं इसलिए जो हाथ लगे हैं वो दिखा रहे हैं.

novelty

अब शहर का भौकाल बहुत ज्यादा बांच लिया है. न जानते हो तो जान लो, लीला टॉकीज में सन 96 में दिलजले पिच्चर देखे थे, अजय देवगन वाली. जिसमें शाम है धुंआं धुंआं गाना था. चलो अब गांव लौटते हैं. वहां इंटर कॉलेज से तीन बीघा दूर माहेश्वरी टॉकीज था. उसकी छत काली पन्नी की थी. उसी कॉलेज से संलग्न प्राइमरी स्कूल भी था. तो प्राइमरी में मैं था, इंटर कॉलेज में बड़ा भाई. सन 95 की बात है. माहेश्वरी में कोई फिल्म लगी थी. जिसमें बड़ी मार धाड़ थी. एकदम चौचक डायलॉग. धांसू गाने और ‘वैसे’ वाले एकाध सीन भी.

single screen

तो एक शो में शिरकत करने जिल्ले इलाही भी पहुंचे. बाहर से टिकट लिया और अंदर दाखिल हुए. माहौल देखकर कलेजा हरियर हो गया. स्कूल की बेंच टाइप की पड़ी थीं. एक पर जाकर तशरीफ टिका दी. अगले तीन घंटे एक ही पोजीशन में बैठे रहना था. पता नहीं कब पीछे से आकर भाई साहब देखने लगे. वो दो चीजें एक साथ देख रहे थे. एक तो चलो पिच्चर हो गई. दूसरी समझ जाओ. फिर देख दाख के घरवापसी हुई. वहां शाम को खाना खाते वक्त भाई साहब बताने लगे इस्टोरी. और उसका जो क्लाइमेक्स वो सुना रहे थे, वो गले नहीं उतर रहा था. वो विलेन को गोली से मरवा रहे थे. जबकि असल में हीरो ने उसके पेट में चाकू से बीसियों वार किए थे. वो कम से कम चार बार गोली से क्लाइमेक्स करा चुके तो मुझसे रहा नहीं गया. मैंने टोककर कहा “अरे चाकू से मारा गया था गुंडा को.” आगे की कहानी आप लिख लेना. मेरे आंसू निकल रहे हैं. बस इतना कहना है कि इन हजार करोड़ियों को समझा दो, हमसे न उलझें. हमारी भावनाओं से न खेलें. थैंक्यू.


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