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'श्रीदेवी की पूजा' जिसके लिए मर्द औरत बन जाते हैं

केरल का एक क़स्बा है कोटकुलनारा. तिरुवनंतपुरम से 82 किलोमीटर दूर. उस कस्बे में एक मंदिर है. श्री देवी मंदिर. हर साल वहां एक अलग किस्म का ‘देवी दरबार’ लगता है. चमयविलक्कू महोत्सव. साल के दो दिन पास-पड़ोस, दूर-दराज के हज़ारों आदमी साड़ियां और लहंगे पहनकर आते हैं. चेहरों पर खूब सारा मेकअप होता है. हाथों में ढेर सारी चूड़ियां. सिर पर लगे विग में गजरा. मेहंदी. लिपस्टिक. काजल.

ये सारे आदमी ट्रांसजेंडर नहीं होते. सिर्फ इस ट्रेडिशन की वजह से वो इस रूप में होते हैं. कई आदमी इसी गेटअप में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ यहां आते हैं. सड़क के दोनों किनारों पर ‘चमयविल्लुक’ यानी दिए जलाते हैं. जान-पहचान के लोगों से मिलते हैं. अनजान लोगों से दोस्ती करते हैं. सड़क पर रथ और झांकी निकलती है. साड़ी और मेकअप से सजे हुए आदमी देवी की पूजा करते हैं. अपनी मन्नत पूरी होने के लिए दुआ करते हैं. मन्नतें भी एक से एक होती हैं. किसी को फॉरेन में नौकरी चाहिए. किसी को एक पत्नी. कोई प्रमोशन की दुआ करने आता है. कोई अपनी टेंशन कम करने की दुआ मांगता है. कई बार लोग अपनी मन्नत पूरी होने के बाद देवी को थैंक्यू बोलने भी औरत बनकर आते हैं. 

पत्थर से ‘खून’ निकला, पुजारी बोले मंदिर बना दो

Image Courtsey: kothakulangaratemple.org / Jayant
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शुरुआत कब और कैसे हुई. इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है. लेकिन एक कहानी सदियों से चली आ रही है. बहुत पहले कोटकुलनारा कस्बे में कुछ लड़के नारियल से कैच-कैच खेल रहे थे. अचानक नारियल एक पत्थर पर गिर गया. गिरा तो टूट गया. नारियल में से खून जैसा कुछ निकला. वहां से एक पुजारी जी गुजर रहे थे. उनको उस पत्थर में भगवान का रूप नज़र आया. उस पत्थर में उनको चमत्कारी शक्ति नज़र आई. उन्होंने उन लड़कों से कहा कि वो पत्थर तुरंत वहीं पर स्थापित कर दिया जाए. फिर उसको देवी मानकर उस पत्थर की तुरंत ही पूजा की जाए. वहीँ बन गया ‘श्री देवी’ मंदिर. उस समय वहां ऐसा कुछ चलन था कि देवी की पूजा औरतें ही कर सकती हैं. लेकिन वहां दूर-दूर तक कोई औरत नहीं थी. पुजारी जी ने उन लड़कों से कहा कि वही लोग लड़की बन जाएं और देवी की पूजा करें. बस उसी समय से लड़कों का लड़की बनकर पूजा करने का सिलसिला शुरू हो गया.

मुसलमान और ईसाई आदमी भी आते हैं यहां औरत बनकर

Image Courtsey: kothakulangaratemple.org / Jayant
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कस्बे के लोगों का मानना है कि ये पूजा धर्म से ऊपर है. असल में ये समाज के हर तबके के लोगों का आपस में मिलने-जुलने का महोत्सव है. धार्मिक और सामाजिक तौर पर केरल अभी भी काफी स्ट्रिक्ट है. रीति-रिवाज़ बहुत स्ट्रिक्टली माने और पूरे किये जाते हैं. ऐसे में ये देवी-पूजा लोगों के आपस में खुलकर मिलने का जरिया है. बाकी त्योहार कई-कई दिन चलते हैं. लेकिन ये केवल दो दिन का जश्न होता है. इसलिए लोग वक़्त निकालकर यहां आ जाते हैं. यहां कोई आदमी किसी को जज नहीं करता. क्रॉस-ड्रेसिंग करने वालों को यहां अलग नहीं फील करवाया जाता. बल्कि पूरा क़स्बा ही दो दिनों के लिए उनके जैसा बन जाता है. कई आदमियों का मानना है कि औरतों के कपड़े पहनने के बाद वो बहुत पोलाइट और शांत महसूस करते हैं. उनका गुस्सा एकदम से कम हो जाता है. और वो खुद को भगवान के करीब महसूस करते हैं.

जादू की छड़ी घुमाने वाले मेकअप आर्टिस्ट

Image Courtsey: kothakulangaratemple.org / Jayant
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आपको मेकअप का थोड़ा सा भी ज्ञान हो. या पेंटिंग वगैरह बना लेते हों. और आपके शहर में दो दिनों के लिए करीब 10,000 ऐसे आदमी इकट्ठे हो जाएं, जो मेकअप कराना चाहते हैं. वैक्स, थ्रेडिंग करवाएं. नकली ब्रेस्ट बनवाएं. विग लगवाएं. उसके बदले आपको अच्छे-खासे पैसे भी देने को तैयार हों. और शहर में ब्यूटी पार्लर कम पड़ रहे हों. आप भी अपनी नौकरी से दो दिन की छुट्टी लेकर मेकअप आर्टिस्ट बन जाएंगे. यही हाल केरल के इस कस्बे के कई आदमियों का होता है. मेकअप करने वालों को भगवान का अवतार ही माना जाता है यहां. जो आदमियों के चेहरे को थोड़े से टचअप से बिलकुल औरतों जैसा बना देते हैं. इतना बदल देते हैं कि खुद आदमी अपनी शक्ल नहीं पहचान पाते. इस महोत्सव की वजह से इन मेकअप आर्टिस्ट लोगों की खूब कमाई भी हो जाती है.

पूरा क़स्बा थिएटर का एक्ट बन जाता है

दो दिनों के लिए कोटकुलनारा का पूरा क़स्बा एक नौटंकी का हिस्सा बन जाता है. हर जगह अलग तमाशे चल रहे होते हैं. कार्निवल जैसा माहौल होता है. रंग-बिरंगे लिपे-पुते चेहरे. औरत बने ‘आदमियों’ से फ़्लर्ट करते हुए दूसरे आदमी. कहीं फोटो खिंचवाते हुए. कहीं साथ में डांस करते हुए. कहीं बहुत सीरियसली देवी की पूजा करते हुए लोग.

इस ट्रेडिशन पर लोगों का विश्वास बहुत पक्का है. कई ऐसे आदमी हैं जिनकी मन्नत कई सालों पहले पूरी हो गई थी. लेकिन वो कहते हैं कि अपनी जिंदगी के आखिर तक वो यहां औरत के गेटअप में आते रहेंगे.

साइकॉलजिस्ट कहते हैं कि ये एक हेल्दी तरीका है लोगों के अंदर के फ्रस्ट्रेशन को निकालने का. घर-परिवार, ऑफिस और काम में लोग इतना उलझे रहते हैं. साथ में केरल का समाज भी बहुत स्ट्रिक्ट है. इस तरह के प्रोग्राम उनको आगे के कामों के लिए तैयार रहने में मदद करते हैं. लोगों की झिझक तोड़ते हैं. ट्रांसजेंडर और क्रॉस-ड्रेसर लोगों की तरफ नजरिया बेहतर बनाते हैं. अभी भी गांव में ऐसे बहुत से लड़के हैं जो लड़कियों से बात नहीं कर पाते. इस महोत्सव की वजह से उनकी झिझक कुछ कम हो जाती है. वो ज्यादा कॉन्फिडेंट हो जाते हैं.

ये हैं वीडियो मंदिर में पूजा करते हुए लोगों का:


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