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30 साल बाद भारत में फौज के लिए नई तोप आई है

दिल्ली की सड़कों के साथ-साथ आसमान में भी बहुत भीड़ होती है. दिन भर में हज़ार के करीब प्लेन यहां आते-जाते हैं. लेकिन 18 मई को एक बड़े खास प्लेन ने दिल्ली की ज़मीन को छुआ. ये अमरीका से M777 अल्ट्रा लाइट होवित्ज़र गन लेकर आया था. तीस साल बाद भारत में कोई नई आर्टिलरी गन आई है.

होवित्ज़र गन होती क्या है?

पुराने ज़माने में फौज के तीन हिस्से होते थे. पैदल सिपाही, घुड़सवार और हाथी पर सवार सैनिक और उनके पीछे तोपखाना. आज की फौज में भी लगभग इसी तर्ज पर तीन कोर होती हैं – सबसे आगे इंफेंट्री, उसके पीछ आर्मड कोर और सबसे पीछे आर्टिलरी. आर्टिलरी के पास अलग-अलग तरह की बड़ी-बड़ी तोप होती हैं जिनसे वो दुश्मन पर बड़े-बड़े गोले गिराते हैं. इन्हीं में से एक होती है होवित्ज़र.

होवित्ज़र गन किसी ऐसी गन को कहते हैं जिसका गोला एक तीखे एंगल पर फायर किया जाता हो, माने 45-90 डिग्री पर. इससे गोला काफी ऊंचाई तक जाता है, और फिर ज़मीन पर लौटता है. तो इससे सीधी ज़मीन के साथ पहाड़ों पर बैठे दुश्मन पर भी फायर किया जा सकता है.

कार्गिल में जीत दिलाने वाली बोफोर्स भी एक होवित्ज़र है.
कारगिल में जीत दिलाने वाली बोफोर्स भी एक होवित्ज़र है.

कारगिल युद्ध की सबसे यादगार तस्वीरों में बोफोर्स गन को फायर करते हुए दिखाया जाता है. बोफोर्स भी एक होवित्ज़र गन है. लेकिन ये 1986 में स्वीडन से इंपोर्ट की गई थी. माने काफी पुरानी है. इसलिए फौज लंबे समय से चाहती थी कि उसके लिए एक नई होवित्ज़र या तो देश में बना ली जाए, या तो विदेश से मंगा ली जाए.

लेकिन देसी होवित्ज़र धनुष के बनने में काफी देरी हुई. ये बोफोर्स के प्लेटफार्म पर ही बनी है और अब तक फील्ड ट्रायल में खुद को साबित नहीं कर पाई है. और बाहर से गन खरीदने पर भी बात बन नहीं पा रही थी. बोफोर्स घोटाले में जिस तरह लोगों के हाथ जले, उसके बाद रक्षा सौदों को लेकर अफसरों और नेताओं दोनों में डर बैठ गया. रक्षा सौदे वैसे भी बहुत पेचीदा होते हैं, एमओयू साइन होने से लेकर फील्ड ट्रायल और असल खरीद तक में काफी माथा पच्ची होती है. तिस पर इतने फूंक-फूंक कर कदम रखे जाने लगे कि मामला कभी असल खरीद तक पहुंचता ही नहीं था.

देसी होवित्ज़र धनुष
देसी होवित्ज़र धनुष

इसलिए जब नवंबर 2016 में भारत ने जब अमरीका से 5000 करोड़ के बदले 145 होवित्ज़र गन खरीदने का करार किया तो ये उसे ऐतिहासिक कहा गया. इसके तहत अमरीका अपने फॉरेन मिलिटरी सेल्स प्रोग्राम के ज़रिए भारत को गन एक्सपोर्ट करने वाला था. ये गन थी BAE Systems की M777A2. इसे आम बोलचाल में M777 कहा जाता है. डील के तहत 25 गन अमरीका से इंपोर्ट की जाएंगी और बाकी भारत में बनेंगी. इसके लिए BAE ने महिंद्रा डिफेंस के साथ करार किया है.

आइए जानें कि M777 में ऐसा क्या है कि इसे फौज के लिए पसंद किया गया:

रेंज
ये 30 किलोमीटर तक गोला फायर कर सकती है. बोफोर्स के मामले में ये दूरी 29 किलोमीटर थी.

रेट ऑफ फायर
M777 30 सेकंड में एक गोला फायर कर देती है. और ऐसा ये लगातार कर सकती है. ये इसका सस्टेंड फायरिंग मोड है. इसके अलावा इसमें एक इंटेस फायरिंग मोड भी है. इसमें ये एक मिनट में 5 गोले फायर कर सकती है. इंटेंस फायरिंग मोड में गन एक बार में 2 मिनट तक रह सकती है.

कहां तैनात होंगी
आर्मी इन्हें नॉर्दन और ईस्टर्न सेक्टर में तैनात करना चाहती है. आर्मी एक नई माउंटेन स्ट्राइक कोर भी खड़ी कर रही है जिसका हेडक्वार्टर बंगाल के पानगढ़ में होगा. इस कोर को भी ये गन मिलेंगी.

हेलिकॉप्टर से ले जाई जाती M777. (फोटोःReuters)
हेलिकॉप्टर से ले जाई जाती M777. (फोटोःWikimedia Commons)

हेलिकॉप्टर से भी ले जाई जा सकती हैं
M777 में एल्यूमिनियम और टाइटेनियम का इस्तेमाल हुआ है. इस तरह इसका वज़न काफी कम हो गया है. करीब सवा चार टन भारी ये गन हैलिकॉप्टर के नीचे टांग कर भी कहीं ले जाई जा सकती है. यानी किसी दुर्गम इलाके में इन्हें घंटों में तैनात किया जा सकता है. दूसरी गन के साथ ये संभव नहीं था क्योंकि वो M777 से लगभग दोगुनी भारी होती हैं. देसी बोफोर्स धनुष गन भी तकरीबन 13 टन की है.

एम्युनिशन

M777 में 155 MM का गोला इस्तेमाल होता. 155 MM गोले का डायमीटर होता है. इसीलिए इस गन को 155 MM गन भी कहते हैं. बोफोर्स  भी एक 155  MM गन है.

चलाने में कितने लोग लगते हैं?

आमतौर पर 7 सैनिक. लेकिन ज़रूरत पड़ने पर 5 सैनिकों का क्रू भी चला सकता है.

अब तक का रिकॉर्ड
M777 दुनियाभर की फौज इस्तेमाल करती हैं. खासकर अमरीका की फौज. हाल के समय में इनका इस्तेमाल अफ्गानिस्तान और इराक में हुआ है.
दिल्ली पहुंची दो गन पहले पोकरण भेजी जाएंगी जहां फौज इन्हें अपनी ज़रूरत के हिसाब से कैलिबरेट करेगी और रेंज टेबल बनाएगी. रेंज टेबल में मौसम और इलाके के हिसाब से गन और उसमें चलाए जाने वाले गोले की सेटिंग्स होती हैं. इसके बाद और ट्रायल होंगे जो एक साल तक चलेंगे.


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