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"जो औरत का दर्द नहीं समझता, भगवान उसे मर्द नहीं समझता"

एक फिल्म का ट्रेलर आया है. पहले वो देखिए. फिल्म के डायरेक्टर अभिषेक सक्सेना हैं. फिल्म में एक्टर शारिब अली हाशमी हैं. फिल्मिस्तान फिल्म से हम इन्हें जानते हैं. ज्योति सेठी और नूतन सूर्या भी इस फिल्म में हैं . फिल्म का नाम फुल्लू है. कहानी गांव के एक लड़के की दिखती है. जो खाली फिरता है. दूसरों की मदद करता है. एक दिन उसे पीरियड्स के दौरान होने वाली दिक्कतों का पता चलता है. साथ ही समझ आता है. गांव की औरतों के लिए ये कितना मुश्किल होता है. वो उनकी मदद करना चाहता है और इस सब के दौरान बहुत कुछ झेलता है. फिल्म 16 जून को रिलीज होने वाली है.

ये फिल्म जिस असल आदमी की कहानी से प्रेरित है थोड़ा सा उसे भी जान लीजिए. फेसबुक पर ये कहानी नितिन ठाकुर ने साझा की थी. जिसे थोड़े से बदलाव के साथ हम साझा कर रहे हैं.

कोयंबटूर में एक लड़का रहता था. नाम था अरुणाचलम मुरुगनाथम. 14 साल की उम्र में उसे स्कूल से निकाल दिया गया. बड़ा हुआ शादी हुई. एक दिन उसने अपनी पत्नी को कुछ छिपाते देखा पता किया तो पता लगा, वो गंदा सा कपड़ा छिपा रही थी जिसका यूज वो पीरियड्स के टाइम कर रही थी. मुरुगनाथम ने बीवी से सैनिटरी नैपकिन खरीदने को कहा, तब पता लगा वो बहुत महंगे आते हैं. 40 पैसे की कॉटन के लिए कंपनियां 4 रुपए वसूल रही थीं. मुरुगनाथम ने फैसला किया कि वो खुद ही सस्ता सैनिटरी नैपकिन बनाकर पत्नी को देंगे.

मुरुगनाथम ने पत्नी को एक पैड बनाकर दिया और इस्तेमाल करके बताने को कहा. उसके सामने संकट ये था कि पैड्स बहुत संख्या में बहुत जल्दी बनाने होते थे. उसने दूसरी औरतों से भी बात की पर मदद हो नहीं पाई. परेशान मुरुगनाथम ने खुद पर प्रयोग करने की ठान ली. फुटबॉल ब्लैडर निकाल कर उसने एक नकली गर्भाशय बनाया. अपने एक दोस्त से लेकर उसमें बकरी का खून भरा. सैनिटरी नैपकिन बनाकर खुद पहना. इसके बाद वो साइकिल चलाने जैसा काम करके देखने लगा ताकि दबाव पड़ने से खून बहे और वो नैपकिन को टेस्ट कर सके.

ये सब जानकर सबने उन्हें पागल समझा . दूरी बना ली. हंसने लगे, मजाक उड़ाते, दोस्त तक गाली देते. खुद उनकी पत्नी डेढ़ साल बाद घर छोड़कर चली गई. मुरुगनाथम ने प्रयोग जारी रखा. बाजार में बिकने वाले पैड्स में अलग क्या होता है ये जानने में भी उन्हें बड़ी समस्या हुई. लोग मानते थे कि मुरुगनाथम पर कोई भूत सवार है और तांत्रिक से उनका इलाज कराया जाए. किसी तरह उसने काम जारी रखा. बार-बार असफल मुरुगनाथम ने अब नैपकिन बनानेवाली कंपनियों से ही पूछना शुरू किया कि वो नैपकिन कैसे बनाती हैं. ज़ाहिर है, कोई उसे क्यों बताता लेकिन कुछ ना कुछ झूठ बोल कर उसने मालूम कर लिया कि नैपकिन में सिर्फ कॉटन नहीं होती बल्कि पेड़ की छाल से निकले सैल्युलोज़ का इस्तेमाल भी होता है.

सवा दो साल बाद ये बात मालूम तो चल गई लेकिन दिक्कत ये थी कि ऐसा नैपकिन बनाने के लिए जैसी मशीन चाहिए थी वो बहुत महंगी थी. साढ़े चार साल की कड़ी मेहनत के बाद मुरुगनाथम ने ऐसी छोटी मशीनें बना लीं जो किसी तरह सस्ता सैनिटरी नैपकिन बना लेती थीं. इस काम को समझने और करने में एक घंटा लगता था. दरअसल अब तक मुरुगनाथम की सोच बदल चुकी थी. उसने सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने की बात तो सोची ही थी, साथ में अब वो ऐसा तरीका विकसित करना चाहते थे जिससे नैपकिन बनाने का काम महिलाएं ही सीख जाएं और उन्हें इस काम की अच्छी कीमत भी मिल सके.

आखिर मुरुगनाथम ने अपनी मां की मजबूरियां भी देखी थीं. मुरुगनाथम लकड़ी की बनी अपनी मशीन को IIT मद्रास ले गए और काम दिखाया. मल्टीनेशनल के सामने अपनी लकड़ी की मशीन से लोहा लेने के उनके जज़्बे से वैज्ञानिक हक्के बक्के थे. IIT मद्रास के नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड कंपटीशन की 943 मशीनों में मरुगनाथम की मशीन नंबर वन थी. तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब मुरुगनाथम को सम्मानित किया तो ये ड्रॉप आउट अचानक ही सुर्खियों में आ गया. आखिर साढ़े 5 साल बाद उसकी पत्नी का पहला फोन आया. वो वापस घर आना चाहती थी. दूरदर्शी मुरुगनाथम ने मशीन को पेटेंट कराने से इनकार कर दिया. डेढ़ साल बाद मुरुगनाथम ढाई सौ मशीनों के साथ खड़ा था जिन्हें उसने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और यूपी पहुंचा दिया. उसके सामने चुनौती थी कि पूर्वाग्रहों और शर्म से भरे इन इलाकों में महिलाओँ को इन मशीनों और सैनिटरी नैपकिन के बारे में कैसे बताए.

हार ना माननेवाले मुरुगनाथम ने धीरे-धीरे ये भी किया और जल्दी ही 23 प्रदेशों के 1300 गांव में मुरुगनाथम की मशीन चलने लगी. 2014 में मुरुगनाथम टाइम्स मैग्ज़ीन की विश्व के सौ प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में से एक थे. 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री दिया. नितिन ठाकुर का ये मूल लेख आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं.


 

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