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हाफ गर्लफ्रेंड फिल्म रिव्यू : अच्छी से थोड़ी ज्यादा, बुरी से थोड़ी कम

सबसे बुरा होता है पूर्वाग्रह. स्टीरियोटाइप्स पूर्वाग्रह की जननी है. बिहारी है तो अंग्रेजी नहीं आती होगी. र को ड़ बोलता होगा. चेतन भगत है तो किताब बुरी होगी. चेतन की किताब है तो उस पर बनने वाली फिल्म भी बुरी होगी. चेतन भगत को सिरे से नकारना साहित्यिक श्रेष्ठता साबित करने की चुल्ल भी थी. लेकिन बात इतनी सी नहीं है न, जिस वक़्त बहुत पढ़े-लिखे लोगों ने उन्हें नकारना शुरू किया तब उनके पास वाजिब वजहें भी थीं. लेकिन बाद में ये भी स्टीरियोटाइप हो गया. जिस नमूने ने जीवन में कुछ न पढ़ा हो, वो भी चेतन भगत को साहित्य पर विपदा बताने से बाज नहीं आता. ये अहं की तुष्टि वाला मामला है. चेतन कैसे लेखक हैं, इस बहस में हम नहीं पड़ते. लेकिन उनके नाम के कारण फिल्म बनकर कैसी आई है, ये तय थोड़े न होगा?  जिस दिन से हाफ गर्लफ्रेंड का ट्रेलर आया, उसे नकारने की होड़ लग गई. फिल्म आने के बाद भी वही हाल है. फिल्म कई मौकों पर कमजोर है. लेकिन ये पूरी फिल्म को नकारने के लिए काफी नहीं है.

कहानी वही जो आप जानते हैं. बिहार का लड़का है. माधव झा. हिंदी मीडियम वाला है. जाहिर है अंग्रेजी में हाथ तंग है. दिल्ली के कॉलेज में पढ़ने जाता है. लड़की है रिया सोमानी. हिंदी मीडियम वालों की आधी जान तो रिया-शनाया-इशिका जैसे नाम सुनकर सूख जाती है. और यहां लड़की ऐसी है जो औकात से बाहर है. हिंदी मीडियम वालों का एक दुःख ये भी होता है. ज़िंदगी में एक-दो ही लोग/चीजें पसंद आती हैं, वो भी औकात से बाहर होती हैं. लड़की को बरसात अच्छी लगती है. बड़े घर की है. बड़े घरों की लड़कियों की एक ही समस्या होती है. मां-बाप की बनती नहीं. ये एक अलग ही किस्म का दुराग्रह है जो फिल्में हमें सिखाती हैं. मां-बाप के झगड़ों से छुटकारा पाने को वो संगीत में जगह तलाशती है. इसी में माधव मदद करता है. और हाफ बॉयफ्रेंड बन जाता है. रिया उसकी हाफ गर्लफ्रेंड बन जाती है. दोस्त से ज्यादा, गर्लफ्रेंड से कम.

Madhav Jha

इस सबके दौरान हिंदी-अंग्रेजी का कनफ्लिक्ट सामने आता है. इस फिल्म में सबसे बेहतर चीज यही है. नॉवेल में हिंदी-इंग्लिश का मुख्य दुखड़ा होने के बावजूद, फिल्म का मूल वही होने के बावजूद, इस चीज को स्थापित करने में बहुत खर्च नहीं हुए हैं. एक अच्छा सा सीन है, जब रिया के घर की पार्टी में माधव का जाना होता है. वहां का माहौल देखकर उन्हें एक बार फिर महसूस होता है कि अंग्रेजी उन्हें कितना दुःख दे रही है. ऐसे सीन हमने फिल्मों में कई-कई बार देखे हैं. जहां किसी पार्टी में हीरो को नीचा दिखाया जाता है. लेकिन ये अलग है, बहुत मौलिक और नेचुरल सा है. ऐसा हम सबने भी अपने जीवन में कई-कई बार झेला है, जब एक चीज अचानक से हमारा नाइटमेयर बनकर सामने आती है. हम उससे बचना चाहते हैं लेकिन वो सबसे कमजोर पलों में हमारे सामने सबसे बुरी तरह से आती है.

arjun kapoor

फिल्म की आलोचना करना चाहें तो एक मुद्दा और है. फिल्म में बहुत बाजार है. वैसे है कहां नहीं? चेतन भगत की फिल्मों भी बहुत नेम कॉलिंग होती है. इसे दर्शक अपने विवेक से अच्छा-बुरा ठहरा सकते हैं. यहां फिल्म में बार-बार ब्रांड प्रमोशन होता दिखता है जो खटकता है. आप फिल्म देखने बैठे हैं, टूथपेस्ट या नूडल्स के ऐड नहीं. कॉलेज के सीन्स में भी बाजार घुसा नज़र आता है. गाने कुछ अच्छे हैं, कुछ भुला दिए जाने लायक हैं. ‘फिर भी तुमको चाहूंगा’ वाला गाना कई बार अता है. नहीं आता तो उसका सत्व रहता है. वो न रहे तो उसका अंग्रेजी तर्जुमा आ जाता है, इससे होता ये है कि जिन दृश्यों में उसे प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया गया है. वहां वो भोथरा साबित होता है.

Rukti hai to ruk warna kat le scene
नॉवेल का चर्चित ‘वर्ना कट ले’ संवाद फिल्म में भी इस्तेमाल किया गया है.

अर्जुन कपूर कम बिहारी नज़र आए हैं. कहो वो बिहारी ही क्या जो ‘र’ को ‘ड़’ न कहे. (स्टीरियोटाइप!! माफ करना)  लेकिन सच मानिए भाषा बहुत फ़िल्मी सी है, बिहारी जैसी कुछ-कुछ लगती है लेकिन अझेल भी नहीं है. ये मानिए कि अर्जुन कपूर ने अपने तरीके से बिहारी बोली है. श्रद्धा कपूर को देखना सुखकारी है. अपने रोल में वो जमी हैं. फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है आप उन्हें पहचानते जाते हैं. उनका किरदार जैसे-जैसे डेवलप होता है, दर्शक उस पूरे समय में उस लड़के की भांति व्यवहार करता है जो चुपचाप अपनी क्रश को जानने की कोशिश कर रहा है.

shraddha kapoor

फर्स्ट हाफ बेहतर है, सेकंड हाफ अंत में खिंच जाता है. नॉवेल पढ़ने वालों को ‘उस स्पीच’ के बारे में पता ही होगा. जिन्होंने नॉवेल न पढ़ा हो स्पीच को ऐसा समझिए कि फिल्म का एक अहम हिस्सा है. लेकिन वो बड़े बचकाने तरीके से शूट किया गया है. बिल गेट्स को भी उस सीन में दिखाया गया है. और मास्किंग बहुत भद्दे तरीके से की गई है. पहले हाफ में जहां फिल्म श्रद्धा और अर्जुन के आस-पास घूमती है, वहीं सेकंड हाफ में कई सारे नए किरदार आने लगते हैं जो आपके कंफर्ट ज़ोन को धक्का पहुंचाते हैं.

arjun new york

अंत में फिल्म एक ऑब्वियस से अंत पर खत्म होती है. आपको रियलाइज होता है एक बार फिर आपको चाय-बिस्किट थमा दिया गया है. लेकिन इसका कोई अफ़सोस नहीं रहता. फिल्म साफ़ सी है, हद से ज्यादा घुमाया नहीं है. किसी भी नॉवेल पर फिल्म बनाते वक़्त कुछ चीजें सीमित सी हो जाती हैं. आप कहानी से बहुत खेल नहीं सकते. नॉवेल चेतन भगत का हो तो समस्याएं और बड़ी हो जाती हैं बाहर दस ढपोरशंख सिर्फ इसलिए फिल्म को बिना देखे नकार देंगे क्योंकि ये चेतन भगत की है.

फिल्म आपको पता है लव स्टोरी है. आप कुछ महान तलाशने जाएंगे वो मिलने से रहा. लेकिन अच्छे से ट्रीट की गई है. सुंदर फिल्म है. कई सीन चीजी हो पड़े हैं, कई जगह सेंटी बनाने की कोशिश की गई है. देखी जा सकती है. प्रेम में पड़े युवा जाकर देखें.  जिनका दिल टूटा है वो जाकर देखें. ज्यादा समझदार लोग कोई अच्छी किताब पढ़ लें :)

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