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"ज़िंदगी एक महाभयंकर चीज़ है, इसे फांसी दे देनी चाहिए"

विजय तेंडुलकर. नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, ललित निबंध लेखक, संपादक, अनुवादक, टॉक शो राइटर, स्क्रीन प्ले लेखक, स्तंभ लेखक और न जाने क्या क्या! ‘बहुमुखी प्रतिभा’ शब्द भी कम लगने लगे, इतना टैलेंट अगर किसी एक ही व्यक्ति में पाया जाए, तो उसका विजय तेंडुलकर होना लाज़मी है.

कहानियों में जो जगह मंटो को हासिल है, शायरी में जो रुतबा साहिर का है, कविता में जो स्थान अज्ञेय के हिस्से आया है, वही सम्मान प्ले-राइटिंग की दुनिया में विजय तेंडुलकर को हासिल है. यूं तो उनका सारा ही काम ऊंचे दर्जे का है, लेकिन नाटककार के रूप में उनका जो योगदान है उसे सही-सही बताने के लिए विशेषण कम पड़ जाएंगे.

उनके लिखे नाटक ‘घाशीराम कोतवाल’ का 6 हज़ार से ज़्यादा बार मंचन हो चुका है. इतनी ज़्यादा बार किसी भी और भारतीय नाटक को नहीं देखा गया है. उनके लिखे नाटकों का हिंदी में अनुवाद तो हुआ ही, और भी कई भाषाओं में अनुवाद हुए. भारतीय नाट्य जगत में उनकी रचनाएं हमेशा-हमेशा सम्मानित रहेंगी. उनके कुछ नाटकों पर बेहतरीन फ़िल्में भी बनी. हिंदी में ‘अर्धसत्य’, ‘निशांत’ और ‘आक्रोश’ इसका उदाहरण है. मराठी में और भी ज़्यादा बनी. उन्होंने भ्रष्टाचार पर, गरीबी पर, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर जम कर कलम चलाई.

इमेज सोर्स: मिड डे.कॉम
इमेज सोर्स: मिड डे

समय के साथ हर साहित्यिक कृति के संदर्भ धुंधलाने लगते हैं. बदलते वक़्त के मुताबिक़ उनकी प्रासंगिकता कम-ज़्यादा हो जाती है. लेकिन विजय तेंडुलकर के लिखे नाटक आज की तारीख़ में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं. बिना एक शब्द की कांट-छाट किए बगैर. ये तथ्य ये बात साबित करने के लिए काफी है कि विजय तेंडुलकर ऐसे अद्भुत कलमकार थे, जिनकी कलम समय की पाबंदियों से आज़ाद थी. ठीक उसी तरह जिस तरह परसाई के व्यंग्य हैं.

6 जनवरी 1928 को पैदा हुए विजय तेंडुलकर की मृत्यु 19 मई 2008 को हुई थी. ‘रजनी’ टीवी सीरियल से मशहूर हुई अभिनेत्री प्रिया तेंडुलकर उनकी बेटी थीं. प्रिया उनसे पहले ही दुनिया छोड़ गईं. 2002 में. विजय तेंडुलकर को कई सारे सम्मान हासिल हुए. श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंथन’ के स्क्रीन प्ले के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला. भारत सरकार ने उन्हें 1984 में पद्मभूषण से सम्मानित किया.

उन्होंने अपनी ज़िंदगी में 27 नाटक और 25 एकांकियां लिखीं. इनमें से कईयों को आज क्लासिक का दर्जा प्राप्त है. इसके अलावा 2 उपन्यास, 5 कहानी संग्रह, 16 बाल-नाटक, साहित्यिक निबंधों के 5 खंड और 1 आत्मकथा उनकी साहित्यिक विरासत है.

आज हम उनके कुछ चुनिंदा नाटकों पर बात करेंगे.


1. खामोश! अदालत जारी है (शांतता! कोर्ट चालु आहे)

1968 में पहली बार इस नाटक का मंचन हुआ. और तबसे आज तक ये ये नाटक दर्शकों को विचलित करने के अपने सामर्थ्य के साथ प्रासंगिक बना हुआ है. दरअसल ये नाटक महज़ नाटक नहीं है. एक अकेली स्त्री की ज़िंदगी में समाज की किस हद तक घुसपैठ होती है और यही समाज कैसे क्रूरता की हद तक असंवेदनशील हो सकता है, इसका दस्तावेज़ है. मज़ाक में शुरू हुई एक कोर्ट की कार्यवाही कैसे एक महिला के लिए मानसिक प्रताड़ना वाला खेल बन जाती है, इसका परत दर परत खुलासा है.

नाटक में मुख्य कैरेक्टर्स के नाम हैं मिस लीला बेणारे, सामंत, सुखात्मे, पोंक्षे, काशीकर. ये सब लोग एक नाटक मंडली के सदस्य हैं. मुंबई से एक छोटे से कस्बे में नाटक करने आ पहुंचे हैं. नाटक के मंचन में अभी समय है. तब तक वक़्तगुज़ारी के लिए एक झूठ-मूठ का मुकदमा खेलने का प्लान बनता है. सब राज़ी हो जाते हैं. मिस बेणारे को आरोपी की भूमिका मिलती है. बाकी पात्रों का चुनाव भी फ़ौरन हो जाता है. सुखात्मे वकील का काला कोट चढ़ा लेते हैं, तो काशीकर जज की कुर्सी पर काबिज़ हो जाते हैं. बाकी सब लोग गवाह वगैरह की भूमिका में घुस जाते हैं. और शुरू होता है नाटक भीतर नाटक.

लीला बेणारे पर आरोप तय होता है. भ्रूण-हत्या का आरोप. लीला बेणारे निश्चिंत है कि ये सब मज़ाक चल रहा है. उसे नहीं पता कि ये सब प्लान कर के हो रहा है. वो सब मज़ाक में लेती है. केस आगे बढ़ता है. गवाहियां होती है. बेणारे सारी प्रक्रिया को हंसी में उड़ाती हुई चलती है. बाकियों से ये बर्दाश्त नहीं होता. उनका ईगो हर्ट हो जाता है. वो पूरे जोश-ओ-खरोश से मिस बेणारे की व्यक्तिगत ज़िंदगी के परखच्चे उड़ाने में जुट जाते हैं. उसकी ज़िंदगी में आ चुके और नहीं आए हुए तमाम मर्दों की चर्चा खुले कोर्ट में होने लगती है. मिस बेणारे को लहूलुहान करने में हर एक शख्स बढ़-चढ़ के हिस्सा लेता है. अपनी जलन, पूर्वाग्रह को हथियार बना कर सब टूट पड़ते है उस पर. एक महिला की पर्सनल लाइफ के चौराहे पर चीथड़े उडाए जाते हैं. खुद को पाक-साफ़ ज़ाहिर करते हुए मिस बेणारे पर जो मन में आए वो इल्ज़ाम लगाए जाते हैं.

जी भर के ‘मज़े लेने के बाद’ अपनी साइड रखने के लिए मिस बेणारे को 10 सेकंड का वक़्त दिया जाता है. पूरी तरह टूट चुकी मिस बेणारे बेजान सी पड़ी रहती है. न्यायाधीश अपना जजमेंट सुनाते हैं. विवाह-संस्था की तारीफ़ करते हुए और मातृत्व के पवित्र होने की ज़रूरत पर जोर देते हुए जज साहब उसका गर्भ नष्ट करने की सज़ा सुनाते हैं.

हिला के रख देने वाले संवाद और दिमाग की नसें झिंझोड़ के रख देने वाला अभिनय इस नाटक को वहां ले गए, जहां भारतीय नाट्य जगत में इसे एवरेस्ट जैसा स्थान हासिल हो गया. अपनी कुंठा में मुब्तिला समाज किस तरह से क्रूर, झूठा, डरपोक और हिंसक होता है, इसका सबूत है ये नाटक. किसी को ध्वस्त कर के विकृत सुख प्राप्त करने में ये समाज जिस हद तक सहज है, वो देख कर सिहरन होती है. विजय तेंडुलकर के लिखे और पहले सुलभा देशपांडे और बाद में रेणुका शहाणे की ज़ुबानी सुने गए इन संवादों की बानगी देखिए.

“मीलॉर्ड, ज़िंदगी एक महाभयंकर चीज़ है. इसे फांसी दे देनी चाहिए. ज़िंदगी से पूछताछ कर के उसे नौकरी से निकाल देना चाहिए. इस ज़िंदगी में सिर्फ एक ही चीज़ है जो सर्वमान्य है. शरीर! ये देखिए बीसवीं सदी के सुसंस्कृत मनुष्य के अवशेष! देखिए कैसे हर एक चेहरा जंगली नज़र आ रहा है. इनके होठों पर घिसे हुए सुंदर-सुंदर लफ्ज़ हैं. और अंदर अतृप्त वासना.”

इसी नाटक पर हिंदी भाषा में एक फ़िल्म भी बनी है जिसका नाम है – ‘खामोश! अदालत जारी है’


2. घाशीराम कोतवाल

विजय तेंडुलकर शायद पहले भारतीय लेखक थे, जिनका काम ‘प्रयोगात्मक थिएटर’ के खांचे में फिट बैठता हो. ह्यूमर, प्रतीकात्मकता का बेहद कामयाबी से इस्तेमाल करते हुए वो सत्ता के घिनौने सच को सफाई से उजागर करते जाते हैं. उनकी इस प्रतिभा का सटीक सबूत है उनका सर्वाधिक मंचित नाटक ‘घाशीराम कोतवाल’. ये उनकी अमर कृति है. पेशवाई के दौर के पुणे शहर में एक बाहरी व्यक्ति के उत्थान और पतन की कथा है ये नाटक.

कहानी कुछ यूं है. घाशीराम कन्नौज का एक सीधा-सादा ब्राह्मण है. रोज़गार की तलाश में नाना फड़णवीस के शहर पुणे आ पहुंचा है. लेकिन पुणे के लोग उसकी बेइज्ज़ती करते हैं. त्रस्त और अपमानित घासीराम बदला लेने की ठानता है. वो कसम खाता है कि पूरे पुणे शहर को इसकी सज़ा देगा. इसके लिए वो एक कुटिल योजना बनाता है. स्त्री के प्रति नानासाहेब की आसक्ति का इस्तेमाल करते हुए, वो अपनी बेटी को चारे की तरह इस्तेमाल करता है. उसका सौदा कर के बदले में पुणे शहर की कोतवाली हासिल कर लेता है.

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कोतवाली हाथ आने के बाद घाशीराम प्रतिशोध का नया अध्याय लिख डालता है. प्रजा के शोषण के नित नए तरीके ईजाद करता है. जनता में डर फ़ैल जाता है. कई लोग बेभाव में मारे जाते हैं. मौके की नज़ाकत को देखते हुए नाना अपना सिक्का चमकाने की जुगत करते हैं. वो घासीराम की बेटी को गायब करवा देते हैं और दूसरा ब्याह रचा लेते हैं. खुद को अच्छा शासक साबित करने के लिए घाशीराम को मृत्युदंड की सज़ा सुनाते हैं. ये एक राजकीय हत्या होती है और कुछ नहीं.

लेखक विजय तेंडुलकर अपनी इस कृति के बारे में कहते हैं,

“घाशीराम कोतवाल’ एक किंवदंती है, एक दंतकथा है. दंतकथा का एक अपना रचना विधान होता है. झीने यथार्थ को जब हम अपनी नैतिकता से रंजित कर कल्पना की सहायता से फिर से जीवित करते हैं, तो एक दंतकथा बन जाती है. दंतकथा गप्प भी है, और देखने की दृष्टि हो, तो एक दाहक अनुभव भी. दाहक अनुभव ही रचनात्मक साहित्य बन पाता है, इसमें कोई शक़ नहीं है.”

यकीनन ‘घाशीराम कोतवाल’ एक दाहक अनुभव है.


3. सखाराम बाइंडर

‘ये नाटक अश्लील है’, ‘इस नाटक की वजह से भारतीय विवाहसंस्था को ख़तरा पैदा हो गया है’, ‘ये नाटक भारतीय संस्कृति पर कालिख मल रहा है’…. ये था वो शोर जो इस नाटक के पहले प्रयोग के बाद चारो तरफ से उठने लगा. सेंसर ने इस नाटक पर बैन लगा दिया. डायरेक्टर कोर्ट में चले गए. आठ महीने की लंबी लड़ाई के बाद केस जीत लिया. फिर से शुरू होने की संभावना बनते ही कुछ नेताओं ने गुंडागर्दी करते हुए इसका मंचन रुकवा दिया. आखिरकार बालासाहेब ठाकरे को राज़ी कर के आगे इसका मंचन मुमकिन हो सका.

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निलू फुले और लालन सारंग जैसे कद्दावर अभिनेताओं ने इसके पहले शो में अभिनय किया था. बाद में मराठी थिएटर के उम्दा कलाकार सयाजी शिंदे और सोनाली कुलकर्णी ने इसे पेश किया.

‘सखाराम बाइंडर’ अपने समय से बहुत आगे की चीज़ आंकी गई. यथार्थवाद की सीमाओं पर अतिक्रमण करता हुआ बल्कि उन्हें लांघ कर आगे बढ़ता हुआ ऐसा लेखन, उस ज़माने में कल्पना से परे था. पुरुषवादी अहंकार की परिधि और उसकी सीमाओं का इतना नंगा लेखा-जोखा सिर्फ विजय तेंडुलकर के ही बस की बात थी.

पेशे से बाइंडर सखाराम अपनी ज़िंदगी का राजा है. समाज द्वारा ठुकराई हुई औरतों को अपने घर में आसरा देता है और बदले में एक बिना ज़िम्मेदारी की ‘पत्नी’ हासिल कर लेता है. एक के बाद एक औरतों को ‘रखना’ और करार की शर्तों का उल्लंघन होने पर उन्हें छोड़ देना उसके लिए रूटीन की बात है. ऐसे में वो लक्ष्मी को – सातवीं महिला को – घर ले आता है. लक्ष्मी अपने पति की रोज़ की मारपीट की वजह से तंग आकर उसे छोड़ आई है. आगे हालात करवट बदलते हैं और सखाराम लक्ष्मी को भी निकाल देता है. इसके बाद जो आठवीं आती है – चंपा – उसके सामने सखाराम का तमाम पुरुषवादी अहंकार छिन्न-भिन्न होकर रह जाता है. असहाय होता जाता सखाराम अपने ईगो की रक्षा के लिए एक्स्ट्रीम स्टेप उठा लेता है.

दबती महिला को और दबाने में सिद्धहस्त पुरुष का सामना जब सशक्त स्त्री से होता है, तो उस पर क्या बीतती है ये इस नाटक में पूरी बेबाकी से दिखाया गया है. इसके संवाद न सिर्फ तीखे थे बल्कि नैतिकता के पैमानों को चैलेंज देते हुए थे. यकीनन ये विजय तेंडुलकर की बेहतरीन रचना है.


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