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प्रेमियों की लोन माफी के बारे में भी सोचिए माई-बाप!

*लौंझड़*

उत्तर प्रदेश, पंजाब, कर्नाटक और महाराष्ट्र किसानों का कर्ज़ माफ कर चुके हैं. कई सरकारें लकीर की फकीर हैं तो वो भी देर सवेर यह काम करेंगी ही. किसानों की कर्ज़ माफी हो रही है तो यह बहुत अच्छी बात है. सरकार ने लाखों करोड़ रुपए का कर्ज़ा औद्योगिक घरानों का पहले ही माफ कर दिया है तो अपने को उससे भी ऐतराज़ नहीं.

लेकिन अपना सवाल है कि प्रेमियों का कर्ज़ माफ कब होगा?

आप मेरे सवाल पर मुस्कुरा सकते हैं लेकिन मैं पूरी गंभीरता से हर राज्य की हर सरकार से जानना चाहता हूं कि आशिकों का कर्ज़ कब माफ होगा? चूंकि आशिकों का कोई एसोसिएशन नहीं है. प्रेमियों की कोई पार्टी, कोई संगठन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उनका कोई दर्द, कोई परेशानी नहीं है. यूं इक्का-दुक्का आशिकों ने कभी-कभार इस सवाल को उठाया है, लेकिन प्रेमी संगठित नहीं है तो उनकी कर्ज़ माफी की मांग कभी आंदोलन नहीं बन पाई.

 

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सच यही है कि समाज में भाई-चारे और प्रेम को बढ़ावा देने के लिए प्रेमियों का कर्ज़ माफ होना चाहिए. एक प्रेमी ही जानता है कि प्रेम को पुष्पित-पल्लवित करने में कितना धन बहाना पड़ता है. कितनी लौंझड़ें उठानी पड़ती हैं. कितने बवाल सहने पड़ते हैं. अच्छा आशिक वो ही साबित होता है,जो महबूब को वक्त दे पाए. वक्त वो प्रेमी ही दे सकता है, जो या तो निठल्ला हो या ऑफिस में बॉस को चकमा देने और काम को गुल्ली लगाने के काम में माहिर हो या कहें कम काम करता हो. यानी अच्छे प्रेमियों के पास अमूमन या तो आय का साधन होता नहीं है या वो बहुत कम कमाते हैं.

ऐसे में प्रेमिका को घुमाने-फिरने से लेकर लंच-डिनर कराने, गिफ्ट देने, फिल्म दिखाने वगैरह में कितना खर्च होता है, ये सिर्फ एक प्रेमी जानता है. फॉर एग्जाम्पल, पॉपकॉर्न-नाचोस के साथ एक मूवी ही आजकल एक-डेढ़ हजार रुपए से कम नहीं पड़ती. गर्लफ्रेंड को बंदा रोज सीसीडी और बरिस्ता में कॉफी ही पिला दे तो गरीबी रेखा के नीचे आ सकता है. फरवरी महीने में तो अच्छे खासे आशिकों का भट्टा बैठ जाता है. वेलेंटाइन डे, रोज डे, गिफ्ट डे, हग डे वगैरह इतने किस्म के डे होते हैं कि प्रेमी टें बोल जाता.

लेकिन वो आह तक नहीं भरता. वो कभी बैंक को नहीं लूटता. मेट्रो में पर्स नहीं मारता. कहीं चोरी नहीं करता. वो सिर्फ कर्ज़ लेता है. दोस्तों से कर्ज़, भाइयों से कर्ज़, बहनों से कर्ज़, बैंक से कर्ज़. कर्ज़ ही कर्ज़.

 

 

People share dishes at a traditional Japanese "Izakaya" pub named Saiki in Tokyo April 7, 2008. REUTERS/Issei Kato
प्रेमिका के दिल का रास्ता भी पेट से ही होकर जाता है. डिनर डेट. (फोटोःरॉयटर्स)

 

समझिए तो प्रेमी कर्ज़ सिर्फ प्रेमिकाओं को खुश रखने के लिए नहीं लेता. वो कर्ज़ इसलिए लेता है ताकि समाज में प्रेम का प्रसार हो. प्यार का दुश्मन ज़माना है और ज़माना खुश प्रेमी-प्रेमिकाओं को देखकर अपना स्टैंड बदलने को मजबूर होता है. या हो सकता है कि प्यार एक बुराई नहीं है. एक प्रेमी इसलिए भी कर्ज़ लेता है ताकि खुश प्रेमी-प्रेमिकाओं को देखकर और ज़्यादा लोग प्यार के लिए प्रेरित हों.

कुल मिलाकर प्रेम को समाज में उचित स्थान मिल सके, इसलिए प्रेमी कर्ज़ लेकर प्रेमिकाओं को खुश रखता है. और जो लड़के एक साथ दो गर्लफ्रेंड को घुमा-फिरा रहे हैं या कहें एक वक्त में दो विकल्पों में से एक को चुनने के संकट से जूझ रहे हैं, उनका हाल तो कर्ज़ के चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की तरह है, जिसकी कर्ज़दारों के हाथों ठुकाई-पिटाई और सुताई तय है.

सरकार को समझना चाहिए कि प्रेमी भी जीडीपी में खासा योगदान देता है. वो कर्ज़ ले लेकर, खुद की ऐसी-तैसी कराकर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है. लेकिन अब अगर आशिक कर्ज़ के दुश्चक्र में फंसा हुआ है तो उसकी भी कर्ज़ माफी होनी चाहिए. यह समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है, और इस पर ध्यान नहीं दिया तो आशिक अपनी पार्टी बना सकते हैं या धरना-प्रदर्शन का रास्ता इख्तियार कर सकते हैं.

बहरहाल, सरकार अभी कुछ नहीं कर सकती तो फौरी राहत के तौर पर आशिकों को बेल आउट पैकेज दे दे. बड़ी महंगाई है जी ! आशिक समुदाय भी पूछ रहा है कि हमारे ‘अच्छे दिन’ कब आएंगे ?


Piyush-pandey-aaj-tak-lallantop_060517-020516_130517-074101_280517-071136_110617-104107पीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम’. पीयूष जी अब हमारे-आपके लिए भी लिख रहे हैं. पाठक उन्हें ‘लौंझड़’ नाम की इस सीरीज में पढ़ रहे हैं. 

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