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राजदीप सरदेसाई ने कश्मीर पर कुछ कहा है

ये आर्टिकल ‘डेली ओ’ के लिए राजदीप सरदेसाई ने लिखा है. इसे दी लल्लनटॉप के लिए आस्था ने ट्रांसलेट किया है.    


कश्मीर को जितना समझने की कोशिश करो, उतना ही उलझता जाता है. पत्थर और बंदूक को लोगों ने खेल का सामान बना दिया है. बंदूक वाले गुड बॉय और पत्थर वाले बैड बॉय. किस तरह का खेल है ये, गुड बॉय बनाम बैड बॉय.  डल झील का पानी जाने कब से लाल है. इस अंधेरी रात में रोशनी की कोई किरण दूर-दूर तक नज़र नहीं आती है.

‘भटके हुए’ नौजवान आज सेना की जीप के आगे आने से पहले दो बार सोचते भी नहीं हैं. और अलगाववादी चुनाव में अपना समर्थन तौलने के बजाय सरहद पार वालों का हुक्म मानना पसंद करते हैं. वहीं सेना के जवान कश्मीरी लोकल्स को नागरिक नहीं, महज़ एक सब्जेक्ट समझते हैं. राजनेता हैं जो आपस में लड़ रहे हैं और घाटी जल रही है. अधिकारी जस के तस हैं. मीडिया पोलराइज़ कर रही है. राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत का झंडा बुलंद कर रही है. कुछ सिर्फ एनकाउंटर में मारे गए सिविलियंस का ब्यौरा दिखा रहे हैं, लेकिन उनके पास शहीद जवानों का आंकड़ा नहीं है. आतंकवादी हैं जिनके लिए मौत एक खेल है. क्या कश्मीर में या कश्मीर के बाहर कोई है जो साफ-सुथरे जमीर के साथ सिर गर्व से उठा सकता हो.

नैतिक और राजनीतिक शून्य बहुत स्पष्ट है. लेकिन हालात की ग्रैविटी और मसले के किसी भी संभावित हल से हम दूर जा रहे हैं. उमर अब्दुल्ला ने एक टीवी शो में मुझसे कहा था, ‘बातचीत शुरू कीजिए.’ मैंने पूछा था कि बात करें तो किससे? क्या कनपटी पर बंदूक रखकर बात की जा सकती है? या फिर उन अलगाववादियों से जो पाकिस्तानी लाइन पर ही बोलते हैं?

प्रधानमंत्री कहते है, टूरिज्म या टेररिज्म में से एक को चुनो. मोदी जी, क्या ये वाकई इतना आसान है? क्या 70 सालों का खूनी राजनीतिक विवाद इतनी आसानी से ख़त्म हो जाएगा? महबूबा मुफ़्ती कहती हैं, हम एक अच्छी शासन प्रणाली लाना चाहते हैं. बेशक आप लाइए, लेकिन सरकार आपकी है. आप बता सकती हैं कि वो मरहम कहां है, जिसकी बात आपके पिता किया करते थे?

कश्मीर हमारे हाथ से निकल रहा है. फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने चेताया था. हां तो डॉ अब्दुल्ला क्या आप बता सकते हैं, आखिर क्यों हम कश्मीर को खो रहे हैं. क्या इसकी वजह आप नहीं है. क्या इसकी वजह ये नहीं है कि आपने अपने कार्यकाल में इसके हल के लिए कुछ भी नहीं किया. आप वही शख्स हैं ना, जिसने 1987 के चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाकर सारे बवाल की शुरुआत की थी.

कश्मीर जवाब चाहता है.

पाकिस्तान चीखता है कि कश्मीर ‘कोर इशू’ है. बिल्कुल सही. लेकिन एक ‘कोर इशू’ को आप कैसे अड्रेस करते हैं. मजहब के नाम पर बंदूकें भिजवाकर उठा कर या धर्म के नाम पर आतंक फैला कर? आप कैसे अपनी एक सीमा पर आतंकवाद के पीड़ित और दूसरी पर इसे फैलाने वाले हो सकते हैं? 

एक रिटायर्ड जनरल कहते हैं, नियंत्रित रहने से काम नहीं बना. वक़्त आ चुका है कि हम आमने-सामने की लड़ाई लड़े. सच में सर? किससे करेंगे लड़ाई? अपने ही देश के लोगों से या अपने न्यूक्लियर ताकत वाले पड़ोसी से? कश्मीर के एक बुद्धिजीवी ने कहा कि दो दशक से वो एक कंसंट्रेशन कैंप में रह रहे हैं. बिल्कुल सही सर, लेकिन कितने कश्मीरियों ने सामने आकर इस खूनी संस्कृति के खिलाफ़ आवाज़ उठाई है, जिसने कश्मीर को एक जेल में तब्दील कर दिया है?

जानी पहचानी एक आवाज कहती है, हम कश्मीरी पंडितों को मत भूल जाना. बिल्कुल  नहीं भूलेंगे. भूलना भी नहीं चाहिए. हां, लेकिन क्या हम ये भूल गए हैं कि कश्मीर में मरने वाले बेकसूरों में सबसे ज्यादा तादाद मुसलमानों की है? एक विडियो में जिहादियों ने इसे ‘पवित्र जंग’ का नाम दिया है. मैं पूछना चाहता हूं कि अल्लाह के नाम पर मासूमों को बेहरमी से मारना कैसी पवित्र जंग है?

ऊपर पूछे गए आधे से ज्यादा सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे. हम शायद जानना ही नहीं चाहते, क्योंकि यह हमारे निजी और सामूहिक दोगलेपन को उजागर करता है.

हमारी बहादुर सेना ने एक स्थानीय युवक को जीप के बोनट पर बांधकर घुमाया. किसी ने भी इसकी आलोचना नहीं की. पुराने हिंदी फिल्मों में जब विलेन किसी गांव वाले को रस्सी से बांध कर घसीटता था तो हम उसे गालियां दिया करते थे. पर अभी हम कुछ नही कहेंगे. आख़िर वर्दी वालों पर हम सवाल कैसे उठा सकते हैं. लेकिन जब कोई कश्मीरी किसी जवान को पानी पिलाता है या जवान बाढ़ में फंसे कश्मीरी की मदद करते है तो चाय की चुस्की के साथ हम इन पर लंबी-लंबी बातें ज़रूर करेंगे.

ये सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं है

मैं भी इंडिया फर्स्ट के कॉन्सेप्ट को मानता हूं. मेरे लिए भी देश पहले आता है. लेकिन मेरे लिए ये सिर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं है. मेरे लिए इंडिया फर्स्ट का मतलब है इंडियन. चाहे वो कश्मीरी हो, आर्मी के जवान या कानून से बंधा कोई भी नागरिक.

बंदूकों से मसले नहीं सुलझाए जाते. जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपई जी कहते हैं, निष्कर्ष तब मिलेगा जब आप लोगों के दिल और दिमाग को जीत सकेंगे. जिसके लिए आप में इंसानियत का होना ज़रूरी है. इंसानियत तब आती है जब आप में जोखिम लेने की क्षमता होती है. जैसा जोखिम वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा करके लिया था और मनमोहन सिंह ने श्रीनगर-मुज़फ्फराबाद बस सर्विस शुरू करके किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीडीपी के साथ गठबंधन करके रिस्क लिया था. आप मिलिट्री फ़ोर्स का इस्तेमाल कर  किसी का दिल नहीं जीत सकते. बिल्कुल वैसे ही जैसे पाकिस्तान क्रॉस-बॉर्डर आंतक फैलाकर कश्मीर नहीं जीत सकता.

कल रात मैंने एक टीवी शो में कश्मीर के खिलाफ़ अपने गुस्से को ज़ाहिर किया. उसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों के कमेंट्स देखकर मुझे उस ‘एंटी नेशनल’ की तरह लगा जो हिटलर के शासन में यहूदियों का हक मांग रहा हो.  कश्मीरी भी भारतीय ही हैं. वो कोई कीड़े-मकौड़े नहीं जिसे रौंद दिया जाए. जवान और कश्मीरी नागरिक दोनों को ही उनका हक मिलना चाहिए. और ये हक तब ही मिलेगा जब वो हम पर विश्वास कर सकेंगे.

हम आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ सकते हैं, अपने भारतीय भाइयों से नहीं. पत्थर की चोट जिस्मों पर नहीं ,इंसानियत पर लगती है. महात्मा गांधी होते तो पत्थर फेंकने वालों और पैलेट गन फायर करने वालों के बीच में खड़े हो जाते. क्या हम से कोई है जो उनकी कमी पूरी कर सके?


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