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चंबल का ये गांव नदी से तैरती हुई लाशें हटा कर पानी भरता है

राजघाट. नाम सुनते ही एक रौबीली सी तस्वीर दिमाग में बनती है. या फिर वो जगह याद आती है जहां बापू दफ़न हैं. लेकिन एक राजघाट ऐसा भी है जहां के घाट के बारे में कुछ भी ऐसा नहीं है जो राजशाही से दूर-दूर तक जुड़ा हो. राजस्थान में एक शहर है धौलपुर. वहां से कुछ किलोमीटर दूर एक गांव है राजघाट. इस गांव की जो स्थिति है, उस पर शायद आप को यकीन न आए. यहां चंबल नदी बहती है. पानी का कोई और सोर्स मौजूद न होने के कारण, लोग उस जगह से पानी भरने के लिए मजबूर हैं. ये एक बहुत ही सामान्य सी बात है. आदमजात की शुरुआत से सभ्यताएं वहीं पनपी हैं जहां पास में पानी का एक सोर्स हो. चाहे वो सिन्धु घाटी सभ्यता हो या मेसोपोटेमिया. नदियां इंसानों को जीवन देती रही हैं.  लेकिन शायद ही कोई इंसानी सभ्यता ऐसी रही होगी जिसने हर रोज़ उस नदी का पानी इस्तेमाल किया हो जिसमें जानवरों की लाशें तैर रही हों. ऐसा होता है इस गांव में जिसका नाम है राजघाट.

चम्बल नदी में, जहां से राजघाट गांव के लोग पानी लेते हैं, मरे हुए जानवरों की लाशों के सिवा मगरमच्छ नज़र आते हैं. पहले डंडे से लाशों को किनारे किया जाता है, और फिर पानी भरा जाता है. ठीक उस वक़्त जब कहीं डिजिटल होते हुए भारत के विज्ञापन मात्र के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे होते हैं, भारत का एक गांव ये भी है जहां टीवी पर आते उस विज्ञापान को देखने के लिए बिजली ही नहीं है. यहां बिजली नहीं है लेकिन फ़ोन ज़रूर हैं. मज़े की बात ये है कि इन फ़ोन को चार्ज करने के लिए लोग राजघाट से बाहर जाते हैं जहां बिजली के खम्बों पर लटके तारों को छूने से झटका लगता है. गांव में सड़क नहीं है. लोगों को गांव में जाने के लिए बीहड़ से हो कर गुज़रना पड़ता है.

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चंबल नदी, जिसमें जाने के लिए कई बार रेस्क्यू टीम के हाथ-पांव फूल जाते हैं. और इन रेस्क्यू टीम को बौना साबित करते हैं यहां के बच्चे जो कुछ सिक्कों को पाने के लिए नदी में कूद पड़ते हैं. इस नदी में मगरमच्छ बाकायदे मौजूद होते हैं जो अब तक कई लोगों को चबा चुके हैं. स्कूल हैं लेकिन बस पांचवीं तक.


राजघाट नगरपरिषद क्षेत्र में आता है. इस लिहाज़ से ये गांव ‘रूरल’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता. इस वजह से रूरल इंडिया को ‘आगे बढ़ाने’ की कवायद में जो भी योजनाएं आ रही हैं, उसका फ़ायदा राजघाट को नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में नगरपरिषद क्षेत्र में इस गांव का आना यहां के लोगों के लिए अभिशाप बन गया है.

राजघाट के साथ एक समस्या और है. शादी. लोग ऐसी जगह अपनी बेटी भेजने को तैयार नहीं हैं. इसी कारण 20 सालों में इस गांव (या शहर?) में बस 2 शादियां हुई हैं. लोग 35-40 साल के हुए जा रहे हैं और शादी होने के कोई आसार नहीं. आखिर क्यों कोई ऐसी बीहड़ जगह अपनी बेटी भेजेगा?

यहां की सरकार भी उनके लिए कुछ करती नज़र नहीं आ रही है. राजस्थान उपचुनाव में भले ही धौलपुर विधानसभा सीट बीजेपी के खाते में गई हो, लेकिन राजघाट को कितनी ही सरकारों के आने-जाने का कोई ख़ास फ़ायदा मिलता नहीं दिखा. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की शादी धौलपुर में ही हुई थी. उन्होंने अपना राजनीतिक करियर 1985 में यहीं से शुरू किया था.

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अंधरे को रोशनी देने के लिए कभी-कभी एक दिया ही काफी होता है. एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर के एमबीबीएस छात्र अश्वनी पाराशर वही दिया हैं. वो इस दिये को उच्छी एलईडी में बदलना चाहते हैं. राजघाट की समस्याओं को उन्होंने समझा और आज के समय में वो गांव वालों के लिए बड़ी उम्मीद बन गए हैं.

दिवाली के दिन अपने 15 दोस्तों के साथ अश्वनी राजघाट पहुंचे. वहां की समस्याओं को समझा. वहां बच्चों के साथ पटाखे और मिठाई बांट कर कुछ खुशियां देने की कोशिश की. यहां से ही उनका सफर शुरू हुआ. आज पूरा गांव उनसे उम्मीद लगाए बैठा है. ऐसे 100 से भी ज्यादा लोग हैं जो उनकी इस नेक काम में सहायता करने के लिए तैयार हैं. अश्वनी और उनके दोस्त राजघाट के 350 से ज्यादा लोगों का सहारा बन गए हैं.

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अश्वनी का मकसद सरकार को हिला कर जगाना है. उन्होंने प्रधान मंत्री ऑफिस को चिट्ठी लिख इस गांव की स्थिति की पूरी जानकारी दी. वो चाहते हैं कि कम से कम इस गांव की बेसिक जरूरतें पूरी हों. राजस्थान सरकार कई गांवों को भूली बैठी है. अश्वनी ये मुहीम अब बड़े लेवल पर छेड़ना चाहते हैं. उन्होंने इस राजघाट को दिल्ली के राजघाट से जोड़ने का निश्चय कर लिया है. #save_rajghat के हैशटैग के साथ जल्द ही वो सोशल मीडिया पर इसे शुरू करने वाले हैं. राजघाट दिल्ली पर save_rajghat के परचे लिए गांव वाले जल्द ही भारत सरकार को उनके फर्ज़ याद दिलाने वाले हैं. जिससे और लोग इसके बारे में जानें और यहां के हालात को सुधारने के लिए सिर्फ कड़े कदम ही न उठें बल्कि काम भी किया जाए.

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ये स्टोरी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रही रुचिका ने की है.


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