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लल्लनटॉप कहानी कम्पटीशन में चुनी गई कहानी - 'आदमी जो बादल बन गया'

साल 2016 का नवंबर. एक गुनगुने महीने में ‘आज तक’ ने एक दो दिवसीय साहित्य उत्सव के बहाने कुछ सरगर्मियां पैदा कीं. इन सरगर्मियों को बढ़ाने में एक बड़ा किरदार ‘लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन’ का भी रहा. यह हिंदी के इतिहास में पहला मौका था, जब साहित्य के किसी समारोह में इस तरह की कोई प्रतियोगिता आयोजित की गई. 10-12 नवंबर, 2017 को एक बार फिर उसी जगह पर होगा साहित्य के शौकीनों का महाजमावड़ा. आप पिछली बार आए हों या न आए हों, इस बार जरूर आइएगा वहां लल्लनटॉप अड्डे पर.

कहानी कंपटीशन का पहला इनाम रखा गया था एक लाख रुपये. नतीजा आ भी गया. संपादक मंडल ने अपने विवेक से पहली कहानी कैफ़ी हाशमी की ‘टमाटर होता है फल’ चुनी. इसके अलावा 15 और कहानियां चुनी गईं. इन्हीं में से एक है ‘आदमी जो बादल बन गया’. इसे आकाश कुमार ने लिखा है. इस कहानी को पढ़ना आधुनिक जीवन-शैली में ढले हुए मनुष्य की विडंबना को पढ़ना है. अकेलापन इस कहानी की बुनियाद है. साहित्यिक भाषा के लिहाज से भी इस कहानी में एक नवाचार देखने को मिलता है. अस्तित्ववादी और जादुई यथार्थ वाली कहानियों की याद अगर इस कहानी को पढ़ कर आ जाए तो कोई अचरज नहीं होगा.


 

आदमी जो बादल बन गया

– आकाश कुमार

 

उसकी नींद अचानक खुल जाती है. पसीने से भीगा हुआ वो खुद को अपने बिस्तर पर पाता है. कूलर का पानी खत्म हो गया है. पंखा ऐसे चल रहा है, मानो अहसान कर रहा हो और हवा देने से उसका कोई वास्ता ही न हो. वो चारों ओर देखता है. कैलेंडर, घड़ी, बुक शेल्फ पर किताबें, दीवार पर चिपका बॉब मार्ले. मानो सब जैसे उस पर हंस रहे हों और उस सपने को भी जानते हों, जो उसने अभी-अभी देखा था. अपने ही कमरे में अजीब महसूस होता है उसे. वो भागकर बालकनी में आ जाता है. बालकनी में खड़ा सिगरेट पीता हुआ वो अपने सपने के बारे में सोच रहा है. वो क्यों बार-बार ये सपने देखता है.

एक बिल्ली है सपने में जो लगातार उसे घूरती रहती है. बिना कोई आवाज निकाले. बालकनी की रेलिंग पर बैठी बिल्ली की आंखें उसे सम्मोहित करती हैं और वो उस सम्मोहन से बाहर आने की कोशिश करता है. वो बिल्ली की तरफ बढ़ता है. बिल्ली उठकर चली जाती है. कई महीनों से ये सपना उसे लगातार आ रहा है.

घड़ी में सुबह के आठ बज रहे हैं. नौ बजे का ऑफिस है. आधा घंटा ट्रैवल में लगेगा. वो तेजी से टॉयलेट में घुसता है. नहाना आज फिर स्किप करना पड़ेगा. वो तेजी से तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल पड़ता है.

ये रोज का रूटीन है उसका. मेट्रो में रोज उसे नए लोग मिलते हैं, लेकिन हर चेहरे में उसे एक ही इंसान का चेहरा नजर आता है. कौन है ये इंसान? सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते समय शीशे में भी उसे यही इंसान नजर आया था. ऑफिस में भी वही इंसान, बाहर सड़कों पर भी वही, अस्पतालों में भी वही, बाजारों में भी वही. सपने की वो बिल्ली और हकीकत का ये इंसान, ये इंसान और वो बिल्ली… सब गड्ड-मड्ड हो जाता है. उसे कुछ समझ नहीं आता. वो ऑफिस पहुंच जाता है.

अटेंडेंस लगाते ही उसके पांव उसे अपनी टेबल पर ले जाते हैं. उंगलियां कंप्यूटर ऑन करती हैं. उसका दिमाग फाइलों में उलझ जाता है. कंसल्टेंसी की इस फर्म में आधे घंटे का लंच ब्रेक होता है. ऑफिस की कैंटीन के बाहर उसे रोज की तरह अमित मिलता है, जो 10 मिनट में अपना खाना निपटाकर बाहर सिगरेट पी रहा है और आते-जाते लोगों को टोक रहा है, ‘‘अरे भई कुमार, सब सई?’’

अमित उसे टोकता है. वो अमित को देखकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाता है. अमित के चेहरे से वही इंसान उसे झांकता दिखाई देता है. शाम ढले, वो वापस घर लौटता है. बिल्डिंग के बाहर ही उसे मकान-मालिक बंसल मिल जाता है. बंसल अपना धमकी भरा प्रस्ताव लेकर आया है, जो वो बेहद मुस्कुराते हुए उसे थमा देता है. अगले महीने से किराए में पांच हजार और. वो अपना महीने भर का बजट जोड़ रहा है, नहीं तो और ज्यादा अफॉर्ड नहीं कर सकता. 30 हजार रुपए की नौकरी में 15 हजार किराए के ही देने पड़ें, तो वो बचाएगा क्या? उसे तो 10 हजार ही ज्यादा लग रहे थे, लेकिन अंजलि के कहने पर उसने वो फ्लैट ले लिया था कि यहां से अंजलि का घर और ऑफिस, दोनों नजदीक हैं. उसने सोच लिया कि अब अगले महीने से नया ठिकाना ही ठीक रहेगा.

संडे की सुबह उसने सोचा था, देर तक सोएगा, लेकिन फिर से वही बिल्ली का सपना. वो जाग जाता है. अमित का फोन आ रहा है. वो बात करता है. शाम को उसे दो घंटे के लिए कुमार का कमरा चाहिए. ‘फुर्सत के पल’ बिताने के लिए. वो हां कर देता है. चाबी डोरमैट के नीचे छोड़ जाएगा वो. आज की शाम वो क्या करेगा, उसे समझ नहीं आता. चार बजे ही वो कमरे से निकल जाता है. बाहर सड़कों पर टहलता है. लोग नजर आते हैं, लेकिन वो किसी की तरफ देखना नहीं चाहता. हर चेहरे में वही इंसान. सामने एक पार्क है. वो अंदर जाकर एक बेंच पर बैठ जाता है. वो उन बच्चों का चेहरा देखता है. हर बच्चे का चेहरा अलग है. बिल्कुल वैसा ही, जैसे वे बच्चे दिख रहे हैं. उत्साह से लबरेज फुटबॉल के पीछे भागते उन बच्चों के चेहरे उसे अच्छे लगते हैं. लेकिन तभी उसे डर लगने लगता है. लगता है जैसे इनका चेहरा भी कुछ सालों बाद उसके, अमित और बाकी लोगों की शक्लों में बदल जाएगा.

वो आसमान में उड़ रहा है. बादलों के बीच. ऊपर से अपने शहर को देखता है. इंसानों की दुनिया को देखता है. उसे ‘इन टू दि वाइल्ड’ फिल्म का क्रिस्टोफर याद आता है, जो अपनी पढ़ाई, करियर, पैसा और परिवार, सब छोड़कर अलास्का के जंगलों-पहाड़ों में चला जाना चाहता है. उसे क्रिस्टोफर से रश्क होता है. उसे भी क्रिस्टोफर जैसी मौत चाहिए. जंगल में अकेले शांत सूरज को देखते हुए, इंसानों से दूर. बादलों की दुनिया उसे अपनी दुनिया लगती है. वो यहीं रह जाना चाहता है.

आंख खुलती है. वो बेंच पर बैठा-बैठा सो गया है. आठ बज गए हैं. अब बाहर खाना खाकर ही वापस फ्लैट पर लौटेगा. तब तक नौ बज जाएंगे. अमित भी जा चुका होगा. सड़क पर निगाहें नीची किए वो चला जा रहा है. अंजलि अब भी उसकी जिंदगी में होती, तो उसकी शाम ऐसी नहीं होती. संडे की शामें पहले कभी ऐसी नहीं बीतीं. सब कुछ पहले जैसा होता, तो शायद वो किसी नई जगह अंजलि के साथ डिनर पर होता.

ढाबे के अंदर जाकर उसने खाने का ऑर्डर दिया और एक खाली टेबल पर आकर बैठा. फोन बजता है. अमित का मेसेज आया है, ‘‘थैंक्स ब्रो’’.

एक महीने बाद

नया फ्लैट उसे अच्छा लग रहा है. सात हजार में ऐसा फ्लैट उसे असंभव-सा लग रहा है. पिछले फ्लैट के मुकाबले सीधे आधी बचत. उसके फ्लैट पर कोई नहीं रहता, उसके सिवा. पांचवा फ्लोर है, शायद इसलिए. लेकिन, कल फर्स्ट फ्लोर वाले एक किराएदार ने उससे कहा कि पांचवे फ्लोर पर कोई चुड़ैल है. तभी मकान-मालिक ने उसे इतने सस्ते में किराए पर दे दिया. उसे हंसी आती है. आज भी ऐसे लोग हैं. वो भी दिल्ली जैसे शहर में. गांवों में तो उसने खूब कहानियां सुनी हैं भूत-प्रेतों की, लेकिन कहां गांव के अनपढ़ भोले-भाले लोग और कहां शहर के ये तेज-तर्रार लोग. क्या कुछ भी नहीं बदला. वो उदास हो जाता है सोचकर.

हर शाम की तरह वो ऑफिस से लौटकर कमरे में दाखिल होता है. कमरे की लाइट पहले से ऑन है. वो चौंकता है. सुबह तो सारी लाइटें वो याद से ऑफ करके जाता है. हमेशा की तरह खुद पर शक करता है. उसी की गलती होगी. भूल गया होगा. रात का खाना उसने खुद बनाया है. कल संडे है, कोई अच्छी सी फिल्म देखकर कल सुबह देर तक सोएगा. बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा है, तभी कोने में एक बिल्ली दिखाई देती है. बिल्कुल उसके सपने जैसी. वैसा ही रंग, वैसी ही आंखें. सम्मोहित करने वाली. बिल्ली घूरे जा रही है. उसे लगता है कि बिल्ली अभी उस पर हंस पड़ेगी. उसकी हिम्मत नहीं पड़ती कि बिल्ली को भगाए या उसकी तरफ जाए. बिल्ली उसे ऐसे देख रही थी, जैसे उसे कितना गिरा हुआ मान रही हो. तभी वो बालकनी की लाइट ऑन करता है, तभी बिल्ली उससे नजरें फेरकर कमरे से होती हुई बाहर निकल जाती है. वो कमरे में वापस आता है. अमित का मैसेज है अगले दिन उसे फिर से कुमार का फ्लैट चाहिए. उसका अब फिल्म देखने का मन नहीं है. वो रिप्लाई में ओके लिखता है और सो जाता है.

अमित शाम को चार बजे आने को कहता है. वो साढ़े तीन बजे डोरमैट के नीचे चाभी छोड़कर निकल जाता है. ‘मॉल’ कहकर वो एक ऑटो रोकता है. आज खुद के लिए कुछ कपड़े खरीदेगा वो. साढ़े चार बजे होंगे. अमित का फोन आया. ‘‘कुमार भाई, मैं तो जा रहा हूं. आप संभालो अपना कमरा.’’ और फोन कट जाता है. ‘‘इसे क्या हुआ?’’ उसे बहुत अजीब लगता है. क्या मकान-मालिक ने कुछ कहा? वापस लौटकर वो अमित को फोन लगाता है. अमित ने जो कहा, उस पर भरोसा करना उसके लिए असंभव है. बिल्ली तो उसने भी देखी थी कल, लेकिन बिल्ली का औरत में बदल जाना!

थोड़ा डर भी लगता है उसे. बालकनी में टहलकर आता है कि कहीं कुछ नहीं! क्या कल मकान-मालिक से बात करे, लेकिन उससे कहेगा क्या, जब तक उसे खुद ऐसा न महसूस हो. खाना बनाने का मन नहीं है उसका, आज बाहर ही खाना खाएगा. उसे पिछली शाम का लाइट ऑन होना याद आता है. चीजों को कनेक्ट करता है वो. क्या वो डर रहा है? उसे गुस्सा आता है खुद पर, ‘क्या चूतियापा है?’. वो इस बारे में सोचना छोड़ने की कोशिश करता है. कोई गाना गुनगुनाता है. अगली सुबह ऑफिस के लिए निकलने से पहले वो सारी लाइट्स ध्यान से बंद करता है. अमित की बात गई नहीं है दिमाग से.

शाम को जब लौटकर उसने अपने फ्लैट का दरवाजा खोला, तो ऊपर से नीचे तक सुन्न पड़ गया. फ्लैट का एक-एक कोना लाइट से नहा रहा था. वो नीचे की तरफ लौटा कि फर्स्ट फ्लोर पर रहने वाले मकान-मालिक को सब कुछ बता दे. मकान-मालिक के दरवाजे पर खड़े होते ही उसे लगा कि वो मकान-मालिक से कहेगा क्या. क्या वो लाइट से डर रहा है. क्या है जिससे वो बचना चाहता है और बचकर कहां जाना चाहता है. कौन-सी दुनिया में. वो वापस लौट आता है. कमरे में लाइट्स पहले की तरह ऑन हैं. वो रोज की तरह घर का काम करता है. खाना बनाता है. सिगरेट पीता है और उसे कुछ भी नया नहीं लगता. सब सामान्य है.

रात अचानक उसकी नींद खुलती है. वही सपने वाली बिल्ली. वो घड़ी देखता है. रात के ढाई बज रहे हैं. प्यास लगती है. उठकर किचेन में जाता है. फ्रिज से पानी निकालकर पी रहा होता है कि उसके पैरों के पास से एक बिल्ली निकलकर भागती है. वो देखता है वही सपने वाली बिल्ली. वो उसके पीछे-पीछे जाता है. बिल्ली बालकनी में चली जाती है. वो बालकनी में जाता है. वहां कोई बिल्ली नहीं है. एक लड़की खड़ी है वहां. लंबे बालों और सफेद कपड़ों में. ठीक वैसी जैसी, फिल्मों में भूतों को दिखाते हैं.

उसका दिमाग घूम जाता है. वो भागकर कमरे में घुसता है. पीछे से आवाज आती है, ‘‘डरो मत, मुझसे बात करो.’’ वो पसीने से भीगा हुआ बिस्तर पर बैठा है और सामने वही लड़की खड़ी है.

इसके बाद वही हुआ, जो फिल्मों और टीवी सीरियलों में पाया जाता है. लड़की खुद को किसी काजल नाम की लड़की की आत्मा बताती है, जिसने इसी कमरे में आत्महत्या कर ली थी.

काजल की आत्मा ने उसे बताया कि उसे भी हर किसी में एक ही चेहरा नजर आता था. वो भी इस दुनिया से ऊब गई थी. उसकी नजर में ये दुनिया गटर में खद-बद कर रहे कीड़ों की दुनिया थी, जहां कोई किसी को नहीं पहचानता. किसी को भी नहीं पता कि वो क्या कर रहा है. हर कोई जैसे किसी मशीन का पुर्जा है. मशीन चल रही है और पुर्जे हिल रहे हैं. कुमार ने उससे कहा कि वो तो बिल्कुल उसके मन की बात कर रही है. क्या अब उसकी दुनिया अच्छी है, जहां काजल की आत्मा रह रही है. इस सवाल पर काजल ने कहा कि उसकी दुनिया बादलों की दुनिया है. वहां लोग नहीं हैं, सिर्फ बादल हैं. वो खुद भी एक बादल है, जो बनता है और बरसता है. फिर बनता है और फिर-फिर बरसता है.

कुमार को लगा जैसे उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो गई हों. उसे जो चाहिए था, उसे मिल गया हो. वो रास्ता जिस पर उसे चलना था, वो उसे दिखाई दे रहा था.

‘‘क्या तुम मेरी दुनिया देखना चाहोगे?’’ उस सफेद आकृति ने पूछा. कुमार ने कुछ नहीं कहा. सिर्फ अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. वो आकृति कुमार का हाथ थामकर आगे बढ़ चली. रेलिंग के ऊपर दोनों साथ खड़े थे.

‘‘आओ उड़ चलें उन बादलों के बीच.’’ उस आकृति ने कहा. थोड़ी देर बाद कुमार ने खुद को बादलों के बीच पाया. वो लड़की साथ नहीं थी. चारों ओर बादल ही बादल. उसने नीचे देखा, कहीं कोई शहर नहीं. शहर का नामों-निशान नहीं. उसे अपनी आत्मा तक सुकून का अहसास हुआ. उसे यहीं आना था. शायद यही वो अवस्था थी, जिसे आनंद कहते हैं. उसने बरसना चाहा और बूंदों-बूंदों में बरस गया. इधर जोर की आवाज सुनकर उसकी बिल्डिंग के आस-पास के लोग जमा हो गए थे. थोड़ी देर बाद पुलिस आई. अगले दिन अखबारों में छपा, ‘‘युवक ने पांचवी मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली.’’

कुमार का सहकर्मी पुलिसवाले को बता रहा था कि कुमार पिछले काफी समय से डिप्रेशन में थे.

कुमार कहीं बादल बनकर सब कुछ देख रहा था और सब पर हंस रहा था.


 

आकाश को जानेंः

आकाश कटिहार में पैदा हुए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में पीएचडी में अध्ययनरत हैं. बचपन में बाल पत्र-पत्रिकाओं में कुछेक तुकबंदियों और अकादमिक रिसर्च के दौरान एपीआई के लिए लिखे गए शोध-आलेखों, समीक्षाओं के अलावा कोई प्रकाशन अब तक नहीं. अच्छा लिखने को मुश्किल काम मानते हैं और मुश्किल कामों से बचने को अपनी आदत.


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