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बूढ़ी काकी का गुजरात में खोया बेटा प्राग में तलाश रहा था

पिछले तीन सालों में लगभग वक्त यात्राओं में ही बीता है। ताबड़तोड़ यात्राएँ। कुछ काम की, ज्यादातर बेवजह। लेकिन इस बार की यात्रा कुछ ऐसी रही कि पीछे के सारे बीत चुके सफ़र याद आते रहे। वह वक्त याद आता रहा जब चमथा से पटना आना ही किसी अनजानी दुनिया में पहुंचने जैसा था। चमथा मेरा गाँव है। बिहार के सुदूर बेगूसराय जिला में। चारों तरफ नदियों से घिरा। एकदम गंगा और गंडक के किनारे बसा। बिहार में इस इलाके को दियारा बोलते हैं। दियारा कुख्यात डकैतों और माफियाओं का सबसे सुरक्षित ठिकाना हुआ करता है। चमथा में पिछले साल तक न तो जाने की पक्की सड़क थी, न बिजली। रेलवे स्टेशन के लिये करीब दस किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता था।

train chanchal

बचपन में हमारी दुनिया गाँव से पटना तक ही सिमटी होती। हमारी कल्पनाओं में पटना से आगे जाने वाले वाली सड़कों का कोई पता नहीं था। पटना जाना अच्छा लगता। आज भी याद है- पैसेंजर ट्रेन में बैठा हूं। विंडो सीट के पास। गले में पानी का थर्मस लटकाए। कभी-कभी अपनी छोटी-छोटी हथेलियों को खिड़की से बाहर करता हूं और झटके से फिर वापिस अंदर कर लेता हूं। आज भी ट्रेन की खिड़की से हथेली बाहर करते ही बचपन की उन ट्रेन यात्राओं में पहुंच जाता हूं।

उन दिनों दिल्ली बहुत दूर की चीज थी। एकदम कोई अनजाना ग्रह। जब पहली बार आया था तो कितने नंबर, जानने वालों के पते की पुर्जी हमारे जेब में थमायी गयी थी। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि दिल्ली के बाद का ज्यादातर समय अनजाने शहरों, गाँवों और छोटे-छोटे कस्बों में ही बीतता चल रहा है।

अनजाने जगहों, लोगों को जानना-बतियाना सब पसंद आने लगा। लेकिन सात समन्दर पार पहुंच जाना सच में कल्पनाओं से बाहर की दुनिया में एन्टर करने जैसा था।

जनवरी की उस सुबह जब एयरपोर्ट के लिये टैक्सी में था, तो उससे करीब महीना भर पहले घटी एक घटना आँखों को भर दे रही थी। गाँव में था। मेरे विदेश जाने को लेकर लगभग पूरे गाँव में खबर है। एक सुबह चश्मा वाली चाची आयी। हम सब उन्हें चश्मा वाली चाची ही कहते हैं क्योंकि वो पावर वाला मोटा चश्मा पहनती हैं। पूरे गाँव के लिये वो चश्मा वाली ही है। चश्मा वाली चाची का बेटा पिछले तीन सालों से घर नहीं लौटा है। गुजरात की किसी कंपनी में ठीक-ठाक नौकरी कर रहा था। फिर एक दिन गायब हो गया। पुलिस, अखबार, पोस्टर, इश्तिहार के बावजूद उसका कोई पता नहीं चल पाया है। गाँव में कुछ लोगों का अंदाजा है उसकी हत्या हो गयी है। कुछ को उम्मीद है कि वो विदेश भाग गया है। चश्मा वाली चाची को दूसरे तर्क में ज्यादा भरोसा है। स्वाभाविक है क्योंकि इसीमें उनके बेटे के लौट आने की उम्मीद है।

river chanchal

उस दिन जब उन्हें पता चला कि मैं विदेश जा रहा हूं तो वो अपने बेटे की तस्वीर लेकर आ गयीं। उनके हिसाब से मुझे विदेश में उनके बेटे के बारे में पता करना चाहिए। मैं अवाक रह गया। मैं उन्हें नहीं बता पाया कि विदेश मतलब होते हैं सैकड़ों देश और मैं जहां जा रहा हूं वो सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है। मैं कुछ भी नहीं बोल पाया। बस झूठे दिलासे के साथ उस तस्वीर को अपने पास रख लिया। जब मैं प्राग की गलियों में भटक रहा था तब भी वह झूठा दिलासा मेरे साथ था। मैं पता नहीं किस अनजानेपन के साथ उस तस्वीर को साथ ले गया। कई बार सच को कितना झूठा मानने का मन करता है। वैसे ही जैसे सच जानते हुए भी मैं प्राग की सड़कों पर टहलते हुए करीब हर भारतीय चेहरे को तस्वीर से मिलाता रहा।

cold prague

जब गाँव में था तो सैकड़ों मासूम सवालों से रुबरू हुआ। कितना घंटा लगेगा पहुंचने में। इतना देर जहाज में कैसे बैठे रहोगे। खाना क्या मिलेगा वहां। कपड़ा क्या पहनोगे। जहाज में पेशाब-पखाना लग गया तो क्या होगा। हिन्दी तो नहीं चलेगा। अंग्रजिये बतियाना पड़ेगा। और भी बहुत से सवाल।

chanchal handpump

आने से पहले नानी गाँव भी गया था। नानाजी बागवानी के शौकीन हैं. फूल, पत्ती, फल की लगभग हरेक वेरायटी उनके बगीचे में है। उनके बगीचा प्रेम की चर्चा आसपास के गाँवों में भी है। नाना जी की जवानी का एक किस्सा बड़ा मशहूर है. गाँव वाले मंदिर के पूजारी ने उनके बगीचे से पूजा के लिये फूल तोड़ लिया था। नानाजी ने आव देखा न ताव उस पुजारी के टिकी (चोटी) को पकड़ कर उसी फूल के पेड़ से बाँध दिया था। गाँव भर के लोग इकट्ठा हुए। तब जाकर मामला संभला।

kansal chanchal

उन्हीं नाना जी को जब पता चला यूरोप में दुनिया के 40 देशों के लोग मिलेंगे तो उन्होंने बगीचे से कागजी निंबू लाकर दिया। यह कहते हुए कि वहां सबको निंबू पानी पिलाना,दाल में डालकर खाना और लोगों को बताना कि ये निंबू पूरी दुनिया में हमारे यहां सबसे अच्छी क्वॉलिटी का होता है। मैं जब वहां प्राग में लोगों को निंबू पानी पिला रहा था तो दोस्त एलिस ने अपने लिये एक निंबू अलग से मांगा और उसे अपने साथ अमरीका ले गयी और कहा- से थैंक्यू टु यूअर ग्रैंडफादर। इट् हैज अमेजिंग टेस्ट।

फिलहाल यह बात मैंने नानाजी को नहीं बतायी है। सोचता हूं यह सुनते हुए उनके चेहरे के भाव और उत्साह को अपनी आँखों से देखना कितना सुखद होगा।

जनवरी की उस सुबह जब प्राग जाने के लिये तड़के तीन बजे की फ्लाइट लेने एयरपोर्ट जा रहा था तो स्वाभाविक ही अपने गाँव का वह छोटी लाइन वाला रेलवे स्टेशन याद हो आया। सुबह छह बजे पटना जाने वाली पैसेंजर ट्रेन को पकड़ने हम ऐसे ही चार बजे ही घर से निकल पड़ते थे।

chanchal car ambasdor

खैर, खूब सारे डर और भ्रम को लिये यूरोप यात्रा से लौट आया हूं। अब गाँव जाने की तैयारी है। सोविनियर खरीदने का कोई मोह नहीं होता। लेकिन यह विदेश यात्रा एक दूसरी दुनिया में जाने और वहां से लौट आने जैसा है। शायद इसलिए ही कुछ चीजें ले आया हूं। मसलन, हरी पत्तियां, कुछ सूख चुकी पीली पत्तियां, कुछ पिक्चर पोस्टकार्ड, ट्राम टिकट, प्राग का नक्शा, जर्मनी से दो बोतल वाइन और ढेर सारे किस्से। कुछ नानाजी के लिये। कुछ गाँव के लिये। कुछ अपनी फेवरेट किताब के बुकमार्क के लिये।
chanchal dalaan home bihar

यूरोप से लौट रहा था तो हवाई जहाज से ऐल्प्स की पहाड़ियां दिख रही थीं। सफेद। बर्फ में ढंकी। और मैं सोच रहा था

हमारा अतीत लालटेन की हल्की पीली रौशनी में लिपटी हुई कोई चीज है। जिसे अब पलट कर देखता हूं तो लगता है- वह कोई तीसरी दुनिया थी, जहाँ से चला था। और जहां पहुंचा हूं, वह भी कोई दूसरी दुनिया ही है। हम सारी दुनियाओं में बाहरी लोग हैं। दरअसल हम बीच-बीच के रह गए। हमारी कोई मुकम्मल दुनिया हो ही नहीं सकती।

chanchal village

अपना घर चमथा छूटा, जवानी का शहर पटना छूटा, मोह का शहर प्राग छोड़ आया और दिल्ली है जो कभी अपना नहीं लगता।


और इसी के साथ चंचल मन का ये सफर रुकता है. फिलहाल से मिलता है. अविनाश चंचल जल्द एक नए सफर की कहानी के साथ आपसे रूबरू होंगे. ये कौल मैंने उनसे पूछे बिना तामील कर दिया है. मगर दी लल्लनटॉप पर जिंदगी यूं ही नजर और शकल बदल आपसे मिलती रहेगी.

इस बहादुर बिहारी बालक की यूरोप यात्रा की पिछली किस्त पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक्स पर क्लिक करें. इस सीरीज का बहुत अच्छा रेस्पॉन्स मिला. थैंक्यू मैडम जी. सर जी. आप लोग पढ़ते हैं. तो हमें हौसला मिलता है. लगता है कुछ सही कर रहे हैं. – सौरभ द्विवेदी

चंचल मन 1  मैं प्राग में जोर से हंसता हूं, तो लोग घूरने लगते हैं

चंचल मन 2 नशे में झूमती लड़कियों को यहां कोई नहीं छेड़ता

चंचल मन 3 ये यूरोप है, पर यहां अंग्रेजी से काम नहीं चलता

चंचल मन 4 वियेना देखकर देश के आदिवासी गांव याद आते हैं

 

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